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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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अनभिरति ] २६१ सक्खर वालुक मच्छगुम्ब एव आाविले हि चित्ते न पस्सति अत्तदत्थ परत्थ ॥ यथोदके अच्छे विप्पसन्ने सो पस्सति सिप्पिकसम्बुकस्सञ्च सक्खर वातुक मच्छगुम्ब एवं अनाविलाह चित्ते । सो पस्सति अत्तदत्य परत्य ॥ [ जिस प्रकार गंदले, मैले पानी में सीपी, शख, कफर, बालू तथा मछ- लियो का समूह नही दिखाई देता, उसी प्रकार अस्थिर चित होने पर आत्मार्थ तथा परार्थ नही सूझता । जिस प्रकार निर्मल, साफ पानी में सीपी, शख, कफर, बालू तथा मछ- लियो का समूह दिखाई देता है, उसी प्रकार स्थिर चित्त होने पर आत्मार्थ तथा परार्थ सूझता है । ] आाविले कीचड से गंदले हुए, अप्पसन्ने उसी गंदलपन के कारण मैले । सिप्पिकसम्बुक, सीपी और शंख । मच्छगुम्ब मछलियो का समूह । एवं आाविले, इसी प्रकार रागादि से अस्थिर चित्त अत्तदत्य परत्य, न आत्मार्थ न परार्थ देखता है—यही अर्थ है। सो पस्सति, इसी प्रकार स्थिर चित्त होने पर वह आदमी आत्मार्थ तथा परार्थ देखता है । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, आार्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । आार्य(सत्यो) का प्रकाशन समाप्त होने पर ब्राह्मण कुमार सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय माणवक वही माणवक था । आचार्य्य तो मे ही था।