BharatKosha
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 335 of 479

Read in context
Page 335

. ३१८ [ २.६.२०४ २०४. वीरक जातक “अपि वीरक पस्सेसि....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय बुद्ध का रग-ढंग बनाने के बारे में कही। क. वर्तमान कथा देवदत्त की परिषद लेकर स्थविरो के लौट आने पर शास्ता ने पूछा— सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ? “भन्ते ! सुगत का रग-ढंग बनाया।” “सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त हुआ। पहले भी प्राप्त हुआ है।” स्थविरो के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हिमालय प्रदेश में जल-कौए की योनि में पैदा हो एक तालाब के पास रहते थे। उसका नाम था वीरक। उस समय काशी देश में अकाल पड़ा। मनुष्य कौओ को भोजन देने या यक्ष-भाग बलिकर्म करने में असमर्थ हो गए। अकाल-पीड़ित प्रदेश से अधिकांश कौवे जगल चले गए। वाराणसी वासी सविट्ठक नाम का एक कौआ अपनी कौवी को ले वीरक के निवासस्थान पर जा, उस तालाब के पास एक ओर रहने लगा। एक दिन उसने उस तालाब में शिकार खोजते हुए वीरक को तालाब में