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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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־ कुरुङ्गमृग ] ३२३ २०६. कुरुङ्गमृग जातक "इङ्घं वद्धमयं पासं .." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के सम्बन्ध मे कही। क. वर्तमान कथा उस समय यह सुनकर कि देवदत्त वध के लिए प्रयत्न करता है शास्ता ने कहा, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्नशील है, उसने पहले भी कोशिश की है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व काल मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व कुरुङ्ग मृग की योनि मे पैदा हो जगल में एक तालाब के पास एक झाडी में रहता था। उसी तालाब के नजदीक वृक्ष पर एक कठफोडा¹ और तालाब मे कछुआ रहता था। वे तीनो परस्पर प्रेम से रहते। एक शिकारी जगल में घूमते हुए पानी पीने के स्थान पर बोधिसत्त्व के पैरो का चिन्ह देख लोहे की जजीर सदृश फंदे वा जाल लगा कर गया। बोधिसत्त्व पानी पीने आकर (रात्रि के) पहले पहर में ही फँस गए, तब फँस जाने की आवाज की। उसकी आवाज सुन वृक्ष-शाखा पर से कठफोडा और पानी मे से कछुआ आया। उन्होने सलाह की—क्या किया जाए? कठफोडे ने कछुवे को सम्बोधन कर कहा—मित्र ! तेरे दांत है। तू जाल को

¹ कठफोडा=शतपत्र ।