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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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३३२ [ २.६.२०६ [यह जो तू समुद्र-पार आम, जामुन और कटहल बताता है, मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे गूलर ही अच्छा है। तेरा शरीर बड़ा है; लेकिन तेरी प्रज्ञा उसके समान नहीं। मगरमच्छ ! तू मेरे द्वारा ठगा गया है। अब तू सुखपूर्वक जा।] ——— अलमेतेहि, जो तूने द्वीप में देंगे, यह मुझे नही चाहिएँ। वरं महं उदुम्बरो मुझे यह उदुम्बर वृक्ष ही अच्छा है। बोन्धि शरीर। तद्रूपिया, तेरी प्रज्ञा तेरे शरीर के अनुकूल नहीं है। गच्छदानि यथासुखं, अब सुखपूर्वक जा, तेरे (लिए) कलेजा नहीं है। ——— मगरमच्छ (जूए में) हजार हार जाने की तरह दुःखी, दौर्मनस्य को प्राप्त हो चिन्ता करता हुआ अपने निवास-स्थान को चला गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मगरमच्छ देवदत्त था। मगरमच्छी चिञ्चामाणविका। कपिराज तो मैं ही था। २०६. कक्कर जातक “दिट्ठा मया वने रुक्खा...."यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर के शिष्य तरुण भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह अपने शरीर की रक्षा करने में होशियार था। शरीर के लिए सुखकर न होगा, इस डर से किसी अति-शीत वा अति-उष्ण चीज का उपयोग न