जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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ऐसा कह यह तीतर भाग कर दूसरी जगह चला गया। उसके भाग जाने के समय चिड़ीमार ने दूसरी गाथा कही— पुराणवट्टरो अयं भेत्वा पञ्जरमागतो, कुसलो वाळपासानं असरसमति भासति ॥ [यह पुराना बटेर पिंजरा तोड़ कर चला आया। घास के फंदे में होशियार परिहास करके चल देता है।] कुसलो वाळपासानं, घास के फंदे में होशियार अपने को न बाँधते देख असरसमति और भासति, बोलकर भाग जाता है। ऐसा कह चिड़ीमार जंगल में घूम जो मिला लेकर घर गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी देवदत्त था। बटेर अपनी शरीर-रक्षा करने में होशियार तरुण भिक्षु। उस बात को प्रत्यक्ष देखने वाला वृक्ष-देवता तो मैं ही था।
२१०. कन्दगलक जातक
अम्भो कोनामयं रुक्खो, यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय सुगत का रग-ढंग बनाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
तब शास्ता ने यह सुन कि देवदत्त ने सुगत का रग-ढंग बनाया कहा— भिक्षुओ ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त हुआ, पहले भी प्राप्त हुआ है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।