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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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दूसरा परिच्छेद ७. वीररणत्थम्भक वर्ग २११. सोमदत्त जातक “अकासि योग्गं…” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय लालुदायी स्थविर के बारे में कही। क. वर्तमान कथा दो तीन जनो के बीच में यह एक शब्द भी न बोल सकता। अधिक लज्जाशील होने के कारण कुछ कहने जाकर कुछ दूसरा ही कह देता। धर्म- सभा में बैठे हुए भिक्षु उसके बारे में चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने आकर पूछा— भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? "अमुक बातचीत” “भिक्षुओ, लालुदायी केवल अभी अधिक लज्जाशील नहीं है, पहले भी लज्जाशील ही रहा है" कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशीदेश में एक ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला में विद्या सीख घर लौटे। यह देख कि माता-पिता बहुत दरिद्र हैं, उसने सोचा कि दुर्गति को प्राप्त माता-पिता की अवस्था सुधारूँगा। माता-पिता की आज्ञा से वह वाराणसी जा राजा की सेवा में रहने लगा। वह राजा को प्रिय हुआ, उसके मन को अच्छा लगने वाला हुआ। उसका बाप दो बैलो से खेती कर पेट पालता था। एक बैल मर गया। उसने बोधिसत्त्व से कहा—तात ! एक बैल मर गया। खेती नहीं होती। २२