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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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सोमदत्त ] ३३६ [ महाराज ! मेरे दो बैल थे, जिनसे खेती होती थी। देव ! उनमें से एक मर गया। राजन् ! दूसरा लें । ] राजा ब्राह्मण से विमुख हो गया। उसके कहने का भाव जान मुस्कराया और बोला—सोमदत्त ! तुम्हारे घर मे मालूम होता है बहुत बैल हैं। "महाराज ! आप देंगे तो हो जाएँगे।" राजा ने बोधिसत्त्व पर प्रसन्न हो ब्राह्मण को सोलह अलङ्कृत बैल और उसका रहने का गाँव ब्रह्मदान दे, बहुत से धन के साथ विदा किया। ब्राह्मण सर्व श्वेत सैन्धव घोड़े जुते रथ पर चढ़ बहुत से अनुयायियों के साथ गाँव आया। बोधिसत्त्व ने रथ में बैठ, पिता के साथ आते हुए कहा— तात ! मैंने सारा साल तुम्हें अभ्यास कराया; लेकिन अन्त में तुमने अपना बैल राजा को दिया । इतना कह यह गाथा कही— अकासि योग्गं धुवमप्पमत्तो संवच्छरं वीररणत्थम्भकस्मि, व्याकासि सञ्ञं परिसं विगय्ह न निय्यमो तायति अप्पपञ्ञं ॥ [ आलस्य रहित हो नित्य साल भर तक वीरण-घास के भुंडो वाले, श्मशान में अभ्यास किया, लेकिन परिषद में जाकर भूल गया। अल्प-प्रज्ञा आदमी का अभ्यास भी त्राण नही करता । ] अकासि योग्गं धुवमप्पमत्तो संवच्छरं वीररणत्थम्भकस्मि, तू नित्य प्रमादरहित हो वीरण के भुंड वाले श्मशान में वर्ष भर अभ्यास करता रहा। व्याकासि सञ्ञं परिसं विगय्ह, परिषद में आकर उस सञ्ज्ञा को विकृत कर दिया; मतलब बदल दिया। न निय्यमो तायति अप्पपञ्ञं, अल्प प्रज्ञा वाले आदमी का नियम, अभ्यास त्राण नही करता; रक्षा नही करता। उसकी बात सुन ब्राह्मण ने दूसरी गाथा कही—

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