जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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भरु ] ३४३ २१३. भरु जातक ' "इसीनमन्तरं कत्वा. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोशल राजाओ के बारे में कही। क. वर्तमान कथा भगवान् के भिक्षुसघ का लाभ तथा सत्कार बहुत था । जैसे कहा है— "उस समय भगवान् का सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और उन्हें चीवर, पिण्डपात (=भिक्षा), शयनासन, रोगी की दवाई आदि चीजें मिलती थी, भिक्षुसघ का भी सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और उसे चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे मिलती थी । लेकिन दूसरे तैथिक परिव्राजको का न सत्कार होता था, न गौरव होता था, न मान होता था, न पूजा होती थी, न आदर होता था और न उन्हें चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे ही मिलती थी ।" इस प्रकार जब उनका लाभ सत्कार जाता रहा तो वे दिन रात छिपकर इकट्ठे हो विचार करते कि जब से श्रमण गौतम पैदा हो गया है तभी से हमारा लाभ सत्कार जाता रहा, श्रमण गौतम को ही श्रेष्ठ लाभ तथा यश मिलता है । क्या कारण है कि इसे यह सब मिलता है ? कुछ ने कहा—श्रमण गौतम सकल जम्बूद्वीप में उत्तम स्थान श्रेष्ठ-भूमि पर रहता है । इसीसे उसे लाभ सत्कार की प्राप्ति होती है । बारी बोले— यही कारण है। हम भी जेतवन मे तैथिक आश्रम बनवाएं । इससे हमको भी लाभ होगा । उन सब ने 'यह ठीक है' निश्चय कर सोचा—यदि हम राजा को बिना सूचित किए आश्रम बनवाएँगे तो भिक्षु रोक देंगे। घूस पाकर पक्षपात न