जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextभरु ] ३४५ ख. अतीत कथा पूर्व काल में भरु राष्ट्र में भरु राजा राज्य करता था। उस समय बोधि- सत्व पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्ति प्राप्त थे। वे गण-शास्ता तपस्वी हो, हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रह नमक खटाई खाने के लिए पाँच सौ तपस्वियो को साथ ले हिमवन्त से उतरे। क्रमश भरु नगर पहुँच, वहाँ भिक्षा माँग, नगर से निकल उत्तर-द्वार पर टहनी-टहनो वाले वट वृक्ष के नीचे बैठ भोजन कर वही रहने लगे। इस प्रकार जब उस ऋषि-समूह को वहाँ रहते आधा महीना हुआ, एक दूसरा गण-शास्ता पाँच सौ तपस्वियो सहित आ, नगर में भिक्षा माँग, नगर से निकल दक्षिण-द्वार पर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ, भोजन कर वही रहने लगा। वे दोनो ऋषि-समूह वहाँ यथारुचि रह कर हिमालय चले गए। उनके चले जाने पर दक्षिण-द्वार का वट वृक्ष सूख गया। अगली बार आने पर दक्षिण-द्वार के वट-वृक्ष के नीचे रहने वालो ने पहले पहुँच जब यह देखा कि उनका वट-वृक्ष सूख गया है, तो वे भिक्षा माँग, नगर से निकल, उत्तर-द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे जा, भोजन कर वही रहने लगे। दूसरे ऋषि पीछे आकर, नगर में भिक्षा माँग, अपने वृक्ष के नीचे पहुँच भोजन कर वहाँ रहने लग। उन दोनो में 'यह तुम्हारा वृक्ष है' 'यह हमारा वृक्ष है' करके झगडा हो गया। झगडा बढ गया। एक पक्ष ने कहा कि हम यहाँ रहने थे, इसलिए इस स्थान पर तुम्हारा अधिकार नही। दूसरे ने कहा कि इस बार हम यहाँ पहले आए, इसलिए तुम्हारा अधिकार नही। इस प्रकार वे दोनो 'हम स्वामी' 'हम स्वामी' करके वृक्ष के नीचे की जगह के लिए झगडा करते हुए राज-कुल गए। राजा ने पहले रहे ऋषि-समूह को ही स्वामी बनाया। दूसरो ने कहा अब हम यह नही कहलाएँगे कि इनसे हार गए। उन्होने दिव्य-चक्षु से चक्रवर्ती राजा के योग्य एक रथ का चौखटा देख, ला, राजा को रिश्वत दे कहा— महाराज ! हमें भी (उस स्थान का) स्वामी बनाएँ। राजा ने रिश्वत ले दोनो समूह रहें (कह) दोनो को स्वामी बनाया। दूसरे ऋषियो ने उस रथ के चौखटे के रत्नो के पहिए लाकर रिश्वत दे कहा— महाराज ! हमें ही स्वामी करें।