जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
DevanagariHindipublished479 pages
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सलीक़ा नही था, मजदूरी करती थी। राजाङ्गन से थोड़ी दूर पर जाते हुए उसे शौच की हाजत हुई। जो वस्त्र पहने हुए थी, उसी से शरीर को ढक कर बैठ गई और हाजत रफ़ा कर तुरन्त उठ खड़ी हुई। झरोखे से राजाङ्गण देखते हुए वाराणसी राजा की उस पर नजर पड़ी। वह सोचने लगा—"इस प्रकार के (खुले) प्राङ्गन में बिना लज्जा को छोड़े वस्त्र से ढके ही ढके, शौच फिरकर यह जल्दी से खड़ी हो गई। यह निरोग होगी। इसकी कोख अति परिशुद्ध होगी। परिशुद्ध-कोख से उत्पन्न हुआ पुत्र भी अति पवित्र तथा पुण्यवान् होगा। मुझे चाहिए कि मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊँ।"