जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextगरहित ] ३६१ २१६. गरहित जातक “हिरञ्ञम्मे सुवण्णम्मे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही, जिसका मन बुद्ध-शासन में नहीं था, जो उत्कण्ठित था। क. वर्तमान कथा इस (भिक्षु) का ध्यान किसी भी बात मे एकाग्र नही होता था। इस अन्यमनस्क हो जीवन बिताते हुए को शास्ता के पास लाए। शास्ता ने पूछा— क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “हाँ, सचमुच ।” “किस कारण से ।” “कामासक्ति के कारण ।” “भिक्षु, कामासक्ति की पूर्व समय में पशुओ ने भी निन्दा की है। तू इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित हो, जिन कामभोगो की पशुओ तक ने निन्दा की है, उनके कारण क्यो उत्कण्ठित हुआ है ?” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हिमालय में बानर की योनि में पैदा हुए। एक बनचर ने उसे पकड लाकर राजा को दिया। वह चिरकाल तक राजभवन में रहने के कारण सभ्यता सीख गया। राजा ने उसके सभ्य-व्यवहार से प्रसन्न हो बनचर को बुलाकर आज्ञा दी—इस बानर को जहाँ से पकड़ा है, वही छोड़ आओ। उसने वैसा ही किया।