जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context३६८ [ २७.२२० से युक्त मनुष्य को देवता भी नही बना सकता। इसलिए उसे कहें कि मुझे चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाकर दे। राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर कहा—आचार्य्य, तूने हमारे लिए उद्यान, पुष्करिणी, हाथी-दांत का प्रासाद, उसमें प्रकाश करने के लिए मणि-रत्न बनाया। अब मेरे उद्यान की रक्षा करने वाला चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाएं। यदि नही बनाएंगे, तो तुम्हारी जान न रहेगी। बोधिसत्त्व 'होवे, मिलने पर दूंगा' कह, घर जा प्रणीत भोजन खा, सोकर जब प्रात काल उठा तो शय्या पर बैठ कर सोचने लगा—देवराज शक्र ने जो स्वय बना सकता था, बनाया। वह चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। ऐसा होने पर दूसरो के हाथ से मरने की अपेक्षा जगल में अनाथ की तरह मरना ही अच्छा है। वह बिना किसीसे कहे, प्रासाद से उतर, मुख्यद्वार से ही नगर से निकल, जगल में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे बैठ सत्पुरुषो के धर्म का ध्यान करने लगा। शक्र को जब यह पता लगा तो उसने एक वनचर की शक्ल बना बोधिसत्त्व के पास जा पूछा—'ब्राह्मण ! तू सुकुमार है। तूने पहले दुख नही देखा सा है। तू इस अरण्य में दाखिल हो बैठा क्या कर रहा है?' यह पूछते हुए पहली गाथा कही— सुखं जीवितरूपोसि रट्ठा विवनमागतो, सो एकको अरण्यस्मिं रुक्खमूले कृपणो विय झायसि ॥ [तू सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सा है। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान में आया है। त जगल में वृक्ष के नीचे अकेला बैठ कृपण की तरह (क्या) सोचता है ?] सुखं जीवितरूपोसि, तू सुख से जीने वाले, सुख से रहने वाले, सुख से पालन हुए की तरह है। रट्ठा जनाकीर्ण स्थान से। विवनमागतो जलरहित स्थान जगल में दाखिल हुआ। रुक्खमूले, वृक्ष के पास। कृपणो विय झायसि, कृपण की तरह अकेला बैठा हुआ ध्यान करता है, विषण्ण ध्यान करता है। तू यह क्या सोच रहा है ?—यही पृच्छा।