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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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धम्मट्ठ ] ` ३७१ "अब्भदा तत्थ बज्झन्ति यत्थ बाला पभासरे, बद्धापि तत्थ मुच्चन्ति यत्थ धीरा पभासरे ॥" इस जातक¹ में आए अनुसार ही एक समय इसे जब यह छत्तपाणी राजा था, चौंसठ नौकरों के साथ अनाचार कर बोधिसत्त्व के द्वारा अपनी इच्छा-पूर्ति न होने के कारण बोधिसत्त्व को नष्ट करने की इच्छा से देवी ने इसे फोड़ा। इसने बोधिसत्त्व को बँधवा दिया। तब बाँधकर लाए गए बोधिसत्त्व ने देवी का यथार्थ दोष कह स्वयं मुक्त हो, राजा के बँधवाए हुए सभी नौकरो को मुक्त करवा राजा को उपदेश दिया कि इनका और देवी का अपराध क्षमा करे। सब पूर्वोक्त प्रकार से विस्तार से कहनी चाहिए। इसीके बारे में कहा है— इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहितं, सो मं अस्ये निवेसेसि तस्माहं अनुसुय्यको ॥ तब मैं सोचने लगा—मै सोलह हजार स्त्रियां छोड़ इस अकेली से कामा- सक्त हो, इसे भी सन्तुष्ट न कर सका। इस प्रकार बड़ी कठिनाई से सन्तुष्ट की जा सकने वाली स्त्रियों का क्रोध करना वैसा ही होता है जैसे कोई कपड़ो के पहनने पर उनके मैले होने से क्रोध करे कि यह मैले क्यो होते हैं, अथवा जैसे कोई खाए भोजन के गूह बनने पर क्रोध करे कि यह ऐसा क्यो होता है ? तब मैने दृढ सकल्प किया कि अब से जब तक अर्हत्व प्राप्त न हो जाए तब तक कामभोग के प्रति मेरी ईर्ष्या न हो। उस समय से मै ईर्ष्या-रहित हो गया। इस सम्बंध से ही तस्माहं अनुसुय्यको कहा। तब राजा ने पूछा—मित्र छत्तपाणि ! किस बात को देखकर तू श्रमणक हो गया ? उसने वह बात कहते हुए यह गाथा कही— मत्तो अहं महाराज पुत्तमंसानि खादियं, तस्स सोकेनहं फुट्ठो मज्जपानं विवज्जंयि ॥ [ महाराज ! मैने मद्य पी बेहोश हो अपने पुत्र के मास को खाया। उस शोक से शोकाभिभूत हो मैने मद्यपान छोड दिया।] बन्धनमोक्ख जातक (१२०)