जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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बात को कहते हुए यह गाथा कही—
कित्तावासो नामह राजा पुत्तो पच्चेकबोधिस,
पत्तं भिन्दित्वा थवितो निस्नेहो तस्स कारणा ॥
[ मैं कित्तबास नाम का राजा था। मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध के पात्र को फोड
कर मर गया। उस कारण से मैं स्नेह रहित हो गया।]
महाराज ! पहले मैं वाराणसी में कित्तवास नाम का राजा था। मुझे
पुत्र हुआ। लक्षण जानने वालो ने उसे देखकर कहा कि इसकी मृत्यु पानी न
मिलने से होगी। उसका नाम दुष्टकुमार रखा गया। बालिग होने पर वह
उपराजा बना।
राजा दुष्टकुमार को सदैव अपने आगे पीछे रखता। पानी न पाकर मरन
के भय से, उसके लिए चारो दरवाजो पर और नगर के भीतर जहाँ तहाँ पुष्क-
रिणियाँ बनवा दीं। चौरस्तो आदि पर मण्डप बनवा पानी की चाटियाँ
रखवाईं।
उसने एक दिन सजधज कर अकेले ही उद्यान जाते हुए रास्ते में प्रत्येकबुद्ध
को देखा। जनता भी प्रत्येकबुद्ध को देखकर उन्ही को प्रणाम करती, प्रशंसा
करती। उन्ही को हाथ जोडती। राजकुमार सोचने लगा—मेरे जैसे के
साथ चलते हुए लोग इस सिर-मुण्डे को प्रणाम करते हैं, प्रशंसा करते हैं, हायें
जोडते हैं। उसने क्रोधित हो, हाथी से उतर प्रत्येकबुद्ध के पास जाकर पूछा—
"श्रमण ! तुझे भोजन मिला?"
"राजकुमार ! हाँ मिला।"
उसने प्रत्येकबुद्ध के हाथ से पात्र ले, उसे जमीन पर पटक, भोजन सहित
पाँव से मर्दन कर, पाँव की ठोकर से चूर चूर कर दिया। प्रत्येकबुद्ध उसके
मुँह की ओर देखने लगे—अब यह प्राणी नष्ट हुआ। कुमार बोला—श्रमण !
मैं कित्तवास राजा का पुत्र हूँ। मेरा नाम है दुष्टकुमार। तू मुझ पर क्रोधित
हो आँखें फाड फाड कर देखने से मेरा क्या करेगा? प्रत्येक-बुद्ध का भोजन
नष्ट हो गया। वे आकाश में उडकर उत्तर हिमालय में नन्दमूल पब्भार पर
ही चले गए। राजकुमार के पापकर्म ने भी उसी क्षण फल दिया। उसके
शरीर में दाह पैदा हुआ। वह जल रहा हूँ कहता हुआ वही गिर पडा।