जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context३६६ [ २.८.२२८ “तो चिकित्सा कर।” “अच्छा महाराज ! मुझे रोग का लक्षण बताएँ। किस कारण से रोग पैदा हुआ ? कुछ खाने पीने के कारण हुआ वा कुछ देखने सुनने के ?” “तात ! मेरा रोग सुनने से पैदा हुआ।” “तूने क्या सुना ?” “तात ! एक तरुण ने आकर कहा कि मैं तीन नगरो या राज्य जीत कर दूंगा। मैने उसे निवासस्थान वा भोजन-खर्च नही दिलवाया। वह मुझसे क्रुद्ध होकर दूसरे राजा के पास चला गया होगा। इस प्रकार 'मेरा इतना बड़ा ऐश्वर्य्य जाता रहा' सोचते रहने के कारण यह रोग पैदा हो गया है। यदि कर सकते हो तो कामना से उत्पन्न रोग की चिकित्सा करो।” इस अर्थ को प्रकट करते हुए पहली गाथा कही— तयो गिरिं अन्तर कामयामि पञ्चाला कुरयो केकये च; ततुत्तरिं ब्राह्मण कामयामि तिकिच्छ मं ब्राह्मण कामनीत ॥ [तीनो नगर और वे जिनकी राजधानी है उन पाञ्चाल, कुरु तथा केकय देश की इच्छा करता हूँ। उससे अधिक भी इच्छा करता हूँ। हे ब्राह्मण ! मुझ कामना-ग्रस्त की चिकित्सा कर।] तयोगिरिं का मतलब है तीन गिरि। अथवा तयोगिरी को ही पाठ समझें। जैसे 'यह सुदर्शनगिरि के द्वार को प्रकाशित करता है' यहाँ सुदर्शन देवनगर को युद्ध करके ग्रहण करना कठिन होने से, अस्थिर करना कठिन होने से सुदर्शन- गिरि कहा गया। इसी प्रकार यहाँ भी तीनो नगरो से मतलब है तीनों गिरि। इसीलिए यही अर्थ है कि तीनो नगर और उनके अन्दर तीनो प्रकार के राष्ट्र की इच्छा करता हूँ। पञ्चाला, कुरयो केकये च यह उन राष्ट्रो के नाम हैं। उनमें पञ्चाला से मतलब है उत्तर पञ्चाल, जहां कम्पिल्ल नगर है। —————— 'निमि जातक (५४१); गाथा १५१