जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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अभिधावथा च पतथा च जल्दी से दौड़ो तथा कूदो। विविध विनन्दिता च दन्तिहि धेष्ठ हाथियो के साथ नाना प्रकार से शोर मचाने वाले होओ। सीटी बजाने, गरजने, बाजे बजाने आदि के नाना प्रकार के शब्द करो। धत्तत्तज्ज तुमलो घोसो आज़ बिजली के सदृश महान् घोष हो। यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो जैसे गरजते हुए बादल के मुंह से निकली हुई बिजलियाँ विचरण करती हैं, उसी प्रकार विचरते हुए, नगर को चारो ओर से घेर कर, राज्य छीन लो,' यही अभिप्राय है।
वह राजा गरज कर सेना को आज्ञा दे नगर-द्वार के समीप गया। वहाँ ड्योढी को देख कर उसने पूछा कि क्या यह राजा के रहने का स्थान है ? यह 'ड्योढी है' सुन उसने सोचा—जब ड्योढी ऐसी है तो राजा का निवास- स्थान कैसा होगा ? उत्तर मिला—वैजयन्त-प्रासाद जैसा। इस प्रकार के ऐश्वर्यशाली राजा के साथ युद्ध न कर सकूँगा, सोच ड्योढी देख कर ही रुक, भाग कर वाराणसी चला आया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वारा- णसी राजा पलासी परिव्राजक था। तक्षशिला-राजा तो मैं ही था।
२३०. दुतियपलासी जातक
"धजमपरिमितं ...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय, एक पलासी परिव्राजक के ही बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
इस कथा में वह परिव्राजक जेतवन में दाखिल हुआ। उस समय जन- समूह से घिरे हुए, अलंकृत धर्मासन पर बैठे हुए, शास्ता मनोशिलातल पर २६