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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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४०८ [ २.६-२३२ तस्स सुतेन खादति अपने ही आपको वह अर्थात् जो दुष्टकुल का अनार्य्य आचार्य्य से विद्या और ज्ञान ग्रहण करता है वह वहाँ ज्ञान से खाता है अर्थात् उसके पास से श्रुतज्ञान से वह अपने को ही नष्ट करता है। अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ ज्ञान से अपने को खाता है' ही अर्थ है। अनरियो वुच्चति पानदूपमो अनार्य्य (आदमी) खराब जूते जैसा कहा जाता है। जिस प्रकार खराब जूते आदमी को खाते है, उसी प्रकार यह ज्ञान से खाता है तो अपने आप अपने को ही खाता है। अथवा जूते से जख्मी पानदू । जूते से पीड़ित, जूते से खाए गए पैर से मतलब है। इसलिए अपने आपको जो ज्ञान से हानि पहुँचाता है, वह उस ज्ञान से खाया जाने के कारण अनार्य्य कहलाता है। पानदूपमो का यही अर्थ है कि जूते से पीड़ित पाँव की तरह। राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को महान् सम्पत्ति दी। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिष्य देवदत्त था। आचार्य्य तो मै ही था। २३२. वीणथूण जातक एकचिन्तितोय अयमत्यो . .यह शास्ता ने जेतवन में विचरते समय एक कुमारी के बारे में कही। ¹ पुरानी सिंहल अट्ठकथा।