जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context[विकण्णक ] ४११ आर्ये ! मैने एक साड को देखकर सोचा कि बैलों म जो ज्येष्ठ होता हैं उसकी पीठ पर एक ककुध होता है। इसकी पीठ पर भी यह है। इसलिए यह पुरुष म वृषभ होगा। इस प्रकार मैने इस कुबडे को पुरुष-वृषभ मान कर इसकी इच्छा की। यह तो जैसे, तार टूटा तूमडी सहित वीणा-दण्ड हो वैसे मुडा हुआ पडा है। बोधिसत्त्व यह जान कि यह अज्ञान के ही कारण घर से निकल पडी, उसे नहला, अलङ्कृत कर, रथ पर चढ़ा कर ल गय। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय यही सेठ की लडकी थी। बाराणसी-सेठ तो मैं ही था। २३३. विकण्णक जातक "कामं मंहि इच्छसि तेन गच्छ " यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा वह धर्मसभा म लाया गया। शास्ता ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? 'सचमुच' कहने पर पूछा—किस कारण से उत्कण्ठित है ? बोला—कामुकता के कारण। शास्ता ने उसे कहा—भिक्षु, कामुकता तीखे शल्य की तरह है। एक बार हृदय में प्रविष्ट होने पर तीर लगे मगरमच्छ की तरह मार ही डालती है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—