जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextवच्छनख ] ४१६ उसकी बात सुन बोधिसत्त्व ने कहा—सेठ ! तू अज्ञान के कारण काम- भोगों में आसक्त होकर गृहस्थी का गुण और प्रव्रज्या का अवगुण कह रहा है। अब तू सुन, मैं गृहस्थी के दोष बताता हूँ। यह कह दूसरी गाथा कही— घरा नानीहमानस्स घरा नाभणतो मुसा, घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो; एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति ॥ [ (नित्य) मेहनत न करने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। झूठ न बोलने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। दूसरा को न ठगते हुए की गृहस्थी नहीं चलती। दण्डत्यागी की गृहस्थी नहीं चलती। इस प्रकार की छिद्रों से पूर्ण, मुश्किल से चलने वाली गृहस्थी को कौन करता है।] घरा नानीहमानस्स नित्य कृषि गोरक्षा आदि करने में परिश्रम न करने वाले की गृहस्थी नहीं (चलती)। गृहस्थी स्थिर नहीं होती। घरा नाभणतो मुसा खेत, वस्तु, हिरण्य, स्वर्ण आदि के लिए झूठ न बोलने वाले की भी गृहस्थी नहीं। घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो जिसने दण्ड नहीं लिया, जिसने दण्ड ग्रहण नहीं किया, जिसने दण्ड रख दिया वैसे दूसरा को न ठगने वाले की भी गृहस्थी नहीं। जो दण्डधारी होकर दूसरों के दासों तथा नौकर चाकर आदि को उस उस अपराध के लिए अपराध के अनुसार वध करना, बाँधना, (अङ्ग-) छेद करना, ताडना आदि करता है उसीकी गृहस्थी ठहरती है। एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति सो अब इस प्रकार डाग आदि के न करने पर अनेक हानियां होने के कारण छिद्रपूर्ण, करने पर नित्य ही करना पड़ने के कारण कठिन, मुश्किल से निभने वाली, नित्य करने पर भी दुरभि- सम्भव तथा मुश्किल से पूरा पडने वाले घर को मैं चिन्ता-रहित होकर करूँगा ? (ऐसा बोलकर) गृहस्थी को कौन करे ? इस प्रकार बोधिसत्त्व गृहस्थी के दोष कह उद्यान ही चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बाराणसी-सेठ रोजमल्ल था। वच्छनख परिव्राजक तो मैं ही था।