BharatKosha
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 445 of 479

Read in context
Page 445

महापिङ्गल ] ४२६ तौर पर राज्य करता था। छन्द आदि के वशीभूत हो पापकर्म करता हुआ दण्डबलि जङ्घ-कार्षापण आदि ले जनता को ऐसे पीडता था जैसे ऊख-यन्त्र ऊख को। वह रौद्र स्वभाव का था, कठोर था और दुस्साहसी था। उसमें दूसरो के लिए तनिक भी दया नही थी। घर मे स्त्रियो या, लडके लडकियो का, अमात्य ब्राह्मणो का तथा गृहपति आदि का भी अप्रिय था। वह ऐसा था मानो आँख में धल हो, भात के कौर मे ककर हो अथवा ऐडी को बीध कर काँटा घुस गया हो। उस समय बोधिसत्त्व महापिङ्गल का पुत्र होकर पैदा हुए। महापिङ्गल चिरकाल तक राज्य करके मर गया। उसके मरने पर सभी वाराणसी वासियो ने हर्षित हो, सन्तुष्ट हो, खूब प्रसन्न हो एक हजार गाडी लकडी से महापिङ्गल को जलाकर अनेक सहस्र घडो से आग बुझाई। फिर बोधिसत्त्व को राज्य पर अभिषिक्त कर 'हमे धार्मिक राजा मिला' सोच (वे) प्रसन्न हो नगर मे उत्सव-भेरी बजवा, ऊँची ध्वजाओ तथा पताकाओ से नगर को अलङ्कृत कर, दरवाजे दरवाजे पर मण्डप बनवा, लाज-पुष्प बिखरे सजे हुए मण्डपो मे बैठ कर खाने पीने लगे। बोधिसत्त्व भी अलङ्कृत महान् तल पर (बिछे) श्रेष्ठ आसन के बीच मे, जिस पर श्वेत छत्र छाया हुआ था बैठे। अमात्य, ब्राह्मण, गृहपति, राष्ट्रिक तथा द्वारपाल आदि राजा को घेर कर खडे थे। एक द्वारपाल थोडी ही दूर पर खडा हो आस्वास-प्रश्वास लेता हुआ रोने लगा। बोधिसत्त्व ने उसे देख पूछा—सोम्य ! मेरे पिता के मरने पर सभी प्रसन्न हो उत्सव मना रहे है। लेकिन तू खडा रो रहा है। क्या मेरा पिता तुम्हे ही प्रिय था ? यह पूछते हुए पहली गाथा कही— सब्बो जनो हिंसितो पिङ्गलेन तस्मि गते पच्चयं वेदयन्ति, पियो नु ते आसि अकण्हनेत्तो कस्मा नु त्वं रोदसि द्वारपाल ॥ [ पिङ्गल ने सब जना को कष्ट दिया । उसके मरने पर सभी आनन्द का अनुभव करते है। हे द्वारपाल ! क्या वह तेरा ही प्रिय था ? तू क्यो रोता है ? ]