जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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बोधिसत्त्व ने “यह है” जान अट्टालिका पर चढ मुनादी करवा दी कि सारी बारह योजन वाराणसी के नगर निवासी अपने अपने कानो के छिद्रो को माष (की दाल) के आटे से लीप लें। जनता ने मुनादी सुन बिल्लियो से लेकर सभी जानवरो के तथा अपने कानो के छिद्र माष के आटे से इस प्रकार लीप लिए कि दूसरे का शब्द न सुन सके। बोधिसत्त्व ने फिर अट्टालिका पर चढकर पुकारा--- “सब्बदाठ !” “ब्राह्मण ! क्या है।” “इस राज्य को कैसे ग्रहण करेगा।” “सिंहनाद करवा कर, मनुष्यो को डरा कर, जान मरवा कर ग्रहण करूँगा।” “सिंहनाद नही करवा सकेगा। जाति-सम्पन्न, लाल हाथ पाँव वाले, केशर सिंह राज तेरे जैसे नीच गीदड की आज्ञा नही मानेंगे।” गीदड ने अभिमान से चूर हो कहा--दूसरे सिंह रहें। जिस सिंह की पीठ पर मै बैठा हूँ उसीसे सिंहनाद करवाऊँगा। “यदि सामर्थ्य है तो सिंहनाद करवा।” जिस सिंह पर बैठा था उसने उसे पांव से इशारा किया कि सिंहनाद कर। सिंह ने हाथी के सिर पर मुंह रख तीन बार ऐसा सिंहनाद किया, जैसा कोई न कर सके। हाथियो ने डरकर गीदड़ को पैरो मे गिरा पाँव से उसके सिर को कुचल चूर्ण विचूर्ण कर दिया। सब्बदाठ वही मर गया। वे हाथी भी सिंह- नाद सुनकर भय के मारे एक दूसरे से भिडकर वही मर गए। सिंहो को छोड़ कर शेष जितने भी खरगोश और बिल्ला से लेकर मृग सूअर आदि थे सभी जानवर वही मर गए। सिंह भाग कर अरण्य मे चले गए। बारह योजन में मास का ढेर लग गया। बोधिसत्त्व ने अटारी से उतर नगर द्वारो को खोल मुनादी करा दी कि सभी अपने कानो में से माष के आटे को निकाल दें और जिन्हे मास की जरूरत हो मास ले जाएं। मनुष्यो ने गीला मास खाया और बाकी को सुखा कर बल्लूर¹ बना लिया। कहते हैं उसी समय से मास सुखाना प्रारम्भ हुआ।
¹ बल्लूर=सूखा मांस।