जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context४४० [ २४३ अन्धे होने के कारण उसे न देख सके। वे समझे चूहे वीणा खा रहे हैं। इसलिए उन्होंने कहा—सू सू चूहे वीणा खा रहे हैं। उस समय मूसिल ने वीणा रखकर बोधिसत्त्व के माता पिता को प्रणाम किया। उन्होंने पूछा—कहाँ से आया ? “उज्जेनी से आचार्य के पास शिल्प सीखने आया हूँ।” “अच्छा।” “आचार्य कहाँ हैं ?” “तात ! बाहर गया है। आज आ जाएगा।” यह सुन मूसिल वहीं बैठ गया। बोधिसत्त्व के आने पर, उसके द्वारा कुशल समाचार पूछे जा चुकने पर उसने अपने आने का कारण कहा। बोधि- सत्त्व अङ्गविद्या के जानकार थे। वे जान गए कि यह सत्पुरुष नहीं है। उन्होंने अस्वीकार किया—तात ! जा तेरे लिए शिल्प नहीं है। मूसिल ने बोधिसत्त्व के माता पिता के चरण पकड़े। उन्हें अपनी सेवा से सन्तुष्ट कर उसने उनसे याचना की कि मुझे शिल्प सिखलवा दें। बोधिसत्त्व ने माता पिता के बारबार कहने पर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन न कर सकने के कारण उसे शिल्प सिखा दिया। वह बोधिसत्त्व के साथ राजदरबार जाता। राजा ने उसे देखकर पूछा— आचार्य ! यह कौन है ? “महाराज !• मेरा शिष्य है।” वह शनै शनै राजा का विश्वासी हो गया। बोधिसत्त्व ने बिना कुछ छिपाए अपना जाना सारा शिल्प सिखाकर कहा—तात ! शिल्प समाप्त हो गया। उसने सोचा—मैंने शिल्प सीख लिया। यह वाराणसी नगर सारे जम्बूद्वीप में श्रेष्ठ नगर है। और आचार्य भी बूढ़े हो गए हैं। मुझे यहीं रहना चाहिए। उसने आचार्य से कहा—आचार्य ! मैं राजा की सेवा करूँगा। आचार्य बोला—अच्छा तात ! मैं राजा से कहूँगा। उसने राजा से जाकर कहा—“महाराज ! हमारा शिष्य देव की सेवा में रहना चाहता है। उसको जो देना हो, जान।” राजा बोला—‘आपको जितना मिलता है, आपके शिष्य को उसका आधा मिलेगा।’ उसने मूसिल को वह बात कही। मूसिल बोला—“मुझे