जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextगुत्तिल ] ४४३ शक्र ने बोधिसत्त्व को तीन गोटियाँ दी और कहा—"सारे नगर पर वीणा शब्द के छा जाने पर इनमें से एक गोटी आकाश में फेंकना। तुम्हारे सामने तीनसौ अप्सराएं उतर कर नाचने लगेगी। उनके नाचने के समय दूसरी फेंकना। दूसरी तीन सौ उतर कर वीणा के सिरे पर नाचने लगेगी। तब तीसरी भी फेंकना। और तीन सौ उतर कर रङ्गमण्डप में नाचेंगी। मैं भी तुम्हारे पास आऊँगा। जाएँ। डरे मत।" बोधिसत्त्व पूर्वाह्ण समय घर गए। राजदरबार में भी मण्डप बनाकर राजासन तैयार कर दिया गया। राजा प्रासाद से उतर सजे मण्डप में आसन के बीच में बैठा। दस हजार अलङ्कृत स्त्रियो तथा अमात्य ब्राह्मण राष्ट्रिक आदि ने राजा को घेर लिया। सभी नगरवासी इकट्ठे हो गए। राजाङ्गण में चवको के साथ चक्के तथा मञ्चो के साथ मञ्च बँध गए। बोधिसत्त्व भी स्नान करके, लेप कर, नाना प्रकार के श्रेष्ठ भोजन खा वीणा ले, अपने लिए बिछे आसन पर बैठे। शक्र गुप्त रूप से आकाश में आकर ठहरा। केवल बोधिसत्त्व ही उसे देख सकते थे। मूसिल भी आकर अपने आसन पर बैठा। जनता घेर कर खडी हुई। आरम्भ में दोनो ने बराबर बराबर बजाया। जनता ने दोनो के बजाने से सन्तुष्ट हो हजारो हर्ष-नाद किए। शक्र ने आकाश में ठहर कर बोधिसत्त्व को ही सुनाते हुए कहा—एक तार तोड दें। बोधिसत्त्व ने भ्रमर-तार तोड दी। वह टूटने पर भी टूटे हुए सिरे से स्वर देती थी। देवगन्धर्व का सा स्वर निकलता था। मूसिल ने भी तार तोड दी। उसमे से स्वर न निकला। आचार्य ने दूसरी—तीसरी करके सातो तारे तोड दी। केवल दण्डे को बजाने से जो स्वर निकला उसने सारे नगर को छा लिया। हजारो वस्त्र फेंके गए तथा हजारो हर्षनाद हुए। बोधि- सत्त्व ने एक गोटी आकाश में फेंकी। तीन सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगी। इस प्रकार दूसरी और तीसरी गोटी के फेंकने पर जैसे कहा गया उसी तरह नौ सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगीं। उस समय राजा ने जनता को इशारा किया। जनता ने उठकर 'तू आचार्य से विरोध कर उसकी बराबरी का प्रयत्न करता है। अपनी सामर्थ्य नही देखता' कहते हुए मूसिल को डरा, जो जो हाथ में आया पत्थर डण्डे आदि से चूर चूर कर, जान मार पैरो से पकड कूडे के ढेर पर फेक दिया। राजा