जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context४५० [ २.१०.२४५ भी तीन पिटक ही जानते हैं। हम भी जानते हैं। तब हमारा उनका क्या अन्तर है? उन्होने बुद्ध की सेवा मे जाना छोड़ दिया। शास्ता की बराबरी के होकर घूमने लगे। एक दिन शास्ता ने उनके आकर पास बैठे रहने के समय आठ भूमियों से सजाकर मूलपरियाय सुत्त का उपदेश दिया। उनकी कुछ समझ में नहीं आया। तब उनको विचार हुआ—हम अभिमान करते हैं कि हमारे समान पण्डित नही। लेकिन अब कुछ नही समझे। बुद्ध के सदृश पण्डित नही हैं। अहो बुद्ध गुण ! उस समय से वह नम्र बन गए, जैसे जैसे सर्प के दांत उखाड दिए गए हो, विष जाता रहा हो। शास्ता ने उक्कठ्ठा मे यथामिरुचि रहकर वैशाली जा वहाँ गोतमक चेतिय मे गोतमकसुत्त का उपदेश दिया। हजार लोकधातु कांप गई। उसे सुनकर वह भिक्षु अर्हत्व को प्राप्त हुए। मूल परियाय सुत्त के उपदेश के अन्त म, जिस समय शास्ता उक्कठ्ठा में ही बिहार करते थे, भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अहो बुद्धो की शक्ति ! वे ब्राह्मण प्रव्रजित वैसे अभिमानी थे। उन्हे भगवान् ने मूल परियाय सुत्त से मान-रहित कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा— भिक्षुओ, न केवल अभी इन अभिमानी सिर वालो को मान रहित किया है, पहले भी किया है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत, कथा पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बडे होने पर तीनो वेदो में पारङ्गत हो प्रसिद्ध आचार्य्य बन पाँच सौ माणवको को मन्त्र बँचवाता था। वे पाँच सौ (माणवक) शिल्प सीखकर, उसका अभ्यास कर सोचने लगे—'जितना हम जानते है, आचार्य्य भी उतना ही। उसमे कुछ विशेष नही।' यह सोच वह अभिमान से चूर हो आचार्य्य के पास न जाते, उसकी सेवा शुश्रूषा न करते। एक दिन जब आचार्य्य बेर के वृक्ष के नीचे बैठा था, उन्होने उसे ठगने की इच्छा से बेर के वृक्ष को नाखून से खुरच कर कहा—यह वृक्ष निस्सार है। बोधिसत्त्व ने यह जान कि यह मुझे ठग रहे हैं कहा—शिष्यो ! एक प्रश्न पूछता हूँ।