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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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[Header] ४५८ [ २.१०.२४६

इस धर्म में शङ्का करता है। यह कह अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी कथा कही— एवं सब्वेहि जाणेहि येसं धम्मा अजानिता, ते वे धम्मेसु कङ्खन्ति किसुकस्मिंव भातरो ॥ [ सभी विषयो में, जो धर्म के जानकार नही हैं वह धर्मों के वारे में वैसे ही शङ्का करते हैं जैसे किसुक के वारे में (चारो) भाई । ]

जैसे वे भाई सभी अवस्थाओ में किसुक को न देखने के कारण सन्देहशील हुए। उसी प्रकार विपश्यना ज्ञान से जिनको सच छ स्पर्धायतन स्कन्ध महाभूत धातु आदि धर्म अज्ञात है, स्रोतापत्ति मार्ग को प्राप्त न किए रहने के कारण, ज्ञानी न हुए रहने के कारण ही (वे) उन स्पर्श आयतन आदि धर्मों मे शका पैदा करते हैं। जैसे एक ही किसुक में चारो भाई ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी राजा में ही था।

२४६. सालक जातक "एकपुत्तको भविस्ससि..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक महास्थविर के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा वह एक कुमार को प्रव्रजित कर उसे कष्ट पहुँचाता रहता था। श्रामणेर ने पीड़ान सह सकने के कारण चीवर त्याग दिया। स्थविर जाकर उसे फुसलाता —कुमारक ! तेरा चीवर तेरा ही रहेगा। पात्र भी। मेरे पास जो पात्र चीवर है वह भी तेरा ही रहेगा। आ प्रव्रजित हो। 'मैं प्रव्रजित नहीं होऊँगा'