जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextबन्धन ] ४३ ‘देव ! किया” रहने पर उसे पीछे हाथ करके बँधवा आज्ञा दी “इन चौंसठ जनो के सीस काट डालो।” बोधिसत्व ने कहा—‘‘महाराज ! इनका दोष नही। रानी ने अपनी मरजी करवाई। यह निरपराध हैं। इसलिए इन्हें क्षमा करें। उसका भी दोष नही। स्त्रियों की मैथुन से सन्तुष्टि नही होती। यह इनका जातीय स्व- भाव है। जो होता है, वही होता है। इसलिए इसे भी क्षमा करें।” यूं राजा को समझाकर, उन चौंसठ जनो तथा उस मूर्ख को छुड़वाकर, उनको उन उन का पद दिलवा दिया। इस प्रकार उन सबको मुक्त करवा, (उनको) अपनी अपनी जगह पर प्रतिष्ठित करवा बोधिसत्त्व ने राजा से कहा—‘‘महाराज ! अन्धे मूर्खों के झूठ कहने के कारण न बाँधने योग्य पण्डितजन पीछे हाथ करके बाँधे गए; और पण्डितो के सहेतुक कथन से पिछली तरफ हाथ बँधे मनुष्य भी मुक्त हुए। इस प्रकार मूर्ख जो बाँधने के योग्य नही हैं, उन्हें भी बँधवा देते हैं और पण्डित बँधे हुओ को भी मुक्त करा देते हैं।” (इतना कह) यह गाथा कही— अबद्धा तत्थ बज्झन्ति यत्थ बाला पभासरे, बद्धापि तत्थ मुच्चन्ति यत्थ धीरा पभासरे॥ [ जहाँ मूर्ख आदमी बोलते हैं, वहाँ मुक्त भी बँध जाते हैं, और जहाँ पण्डित-जन बोलते हैं, वहाँ बँधे हुए भी मुक्त हो जाते हैं। ] अबद्धा, जो बँधे हुए नही हैं। पभासरे, भाषण करते है, बोलते है, कहते हैं। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने इस गाथा द्वारा राजा को धर्मोपदेश दे राजा से कहा—‘‘मैने जो यह दुःख भोगा, वह गृहस्थ जीवन में रहते भोगा। अब मुझे गृहस्थ रहने की जरूरत नही है। देव ! मुझे प्रव्रजित होने की आज्ञा दें।” राजा से प्रव्रजित होने की आज्ञा ले रोते हुए रिश्तेदारो, तथा बहुत सी सम्पत्ति को छोड़ ऋपियों के क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण कर बोधिसत्त्व हिमालय में रहते हुए अभिञ्जा और समापत्तियाँ प्राप्त कर ब्रह्मलोक-गामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दुष्टदेवी चिञ्चमाणविका थी। राजा आनन्द था। परोहित तो मैं ही था।