ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextमाया और मुक्ति १३३
जीवन के सभी अशुभों पर विजय-प्राप्ति की सम्भावना रहती है। और तो क्या, जीवन और जगत् के ऊपर भी विजयप्राप्ति की आशा रहती है। इसी उपाय से मनुष्य अपने पैरो पर खडा हो सकता है। अतएव जो लोग इस विजयप्राप्ति के लिये, सत्य के लिये, धर्म के लिये चेष्टा कर रहे है वे ही सत्य पथ पर हैं, और सब वेद भी यही प्रचार करते हैं, “निराश मत होओ, मार्ग बडा कठिन है--जैसे छुरे की धार पर चलना; फिर भी निराश मत होओ; उठो, जागो और अपने चरम आदर्श को प्राप्त करो।”
सभी विभिन्न धर्मों की, चाहे वे किसी भी रूप मे मनुष्य के निकट अपनी अभिव्यक्ति करते हो, सब की यही एक मूलभित्ति है। सभी धर्म जगत् के बाहर जाने का अर्थात् मुक्ति का उपदेश देते है। इन सब धर्मों का उद्देश्य—संसार और धर्म के बीच सुलह कराना नही, किन्तु धर्म को अपने आदर्श मे दृढप्रतिष्ठित करना है, संसार के साथ सुलह करके उस आदर्श को नीचे नहीं लाना—प्रत्येक धर्म इसका प्रचार करता है और वेदान्त का कर्तव्य है—विभिन्न धर्मभावों का सामञ्जस्य स्थापित करना, जैसा हमने अभी देखा कि मुक्ति की बात को लेकर जगत् के उच्चतम और निम्नतम धर्मों मे सामञ्जस्य पाया जाता है। हम जिसको अत्यन्त घृणित कुसंस्कार कहते है, और जो सर्वोच्च दर्शन है सभी की यह एक साधारण भित्ति है कि वे सभी इस एक प्रकार के सङ्कट से निस्तार पाने का मार्ग दिखाते है और इन सब धर्मों मे से अधिकांश मे प्रपंचातीत पुरुषविशेष की सहायता से—प्राकृतिक नियमो से आबद्ध नही अर्थात् नित्य मुक्त पुरुषविशेष की सहायता से—इस मुक्ति की प्राप्ति करनी पड़ती है। इस मुक्त पुरुष के स्वरूप के