Skip to content
BharatKosha
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 139 of 332

Read in context
Page 139

माया और मुक्ति १३५

आहते होकर बद्ध के समान मालूम होते है किन्तु उसी क्षण, उसी आघात के साथ ही साथ, 'हम बद्ध है' इस भाव के साथ ही साथ और भी एक भाव हमारे अन्दर आता है कि हम मुक्त है। मानों हमारे अन्दर से कोई हमे यह कहने को बाध्य कर रहा है कि हम मुक्त है। किन्तु इस मुक्ति की प्राणो से उपलब्धि करने मे, अपने मुक्त स्वभाव का प्रकाश करने मे सब बाधाये उपस्थित होती है वे भी एक प्रकार से अनतिक्रमणीय है। तथापि अन्दर से हमारे हृदय के अन्त-स्तल मे मानो वह आवाज़ सदा ही उठती रहती है—मैं मुक्त हूँ, मै मुक्त हूँ। और यदि तुम ससार के सभी धर्मों की आलोचना करके देखो तो समझोगे—उनमे से सभी मे किसी न किसी रूप मे यह भाव प्रकाशित हुआ है। केवल धर्म में ही नही—धर्म शब्द को आप संकीर्ण अर्थ में मत लीजिये—सभी प्रकार का सामाजिक जीवन केवल इसी एक मुक्त भाव की अभिव्यक्ति मात्र है। सभी प्रकार की सामाजिक गति उसी एक मुक्त भाव का विभिन्न प्रकाश मात्र है। मानो सभी लोग जान बूझकर या अनजाने ही उस स्वर को सुन रहे हैं जो दिन रात कह रहा है, “ओ थके हुये और बोझ से लदे हुये मनुष्यो! मेरे पास आओ!” एक ही प्रकार की भाषा अथवा एक ही ढंग से, चाहे वह प्रकाशित न होती हो, किन्तु मुक्ति की ओर हमें आह्वान करने वाली वह वाणी किसी न किसी रूप मे हमारे साथ सदा वर्तमान रहती है। हमारा यहाँ जो जन्म हुआ है वह भी इसी वाणी के कारण; हमारी प्रत्येक गति ही इसी के लिये है। हम जानें या न जाने, किन्तु हम सभी मुक्ति की ओर चल रहे हे, जान कर या अनजाने हम उसी वाणी का अनसरण कर रहे है।