ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in context७. ब्रह्म और जगत्
अद्वैत वेदान्त के इस विषय की धारणा करना अत्यन्त कठिन है कि जो ब्रह्म अनन्त है वह सान्त अथवा ससीम किस प्रकार हुआ। यह प्रश्न मनुष्य सर्वदा करता रहेगा किन्तु जीवन भर इस प्रश्न का विचार करते रहने पर भी उसके हृदय से यह प्रश्न कभी दूर नही होगा—जो असीम है वह सीमित कैसे हुआ ? मैं अब इसी प्रश्न को लेकर आलोचना करूँगा । इसको ठीक प्रकार से समझाने के लिये मैं नीचे दिये हुये चित्र की सहायता लूँगा ।
| (क) ब्रह्म |
|---|
| (ग)<br>देश<br>काल<br>निमित्त |
| (ख) जगत् |
इस चित्र मे (क) ब्रह्म है और (ख) है जगत् । ब्रह्म ही जगत् हो गया है। यहाँ पर जगत् शब्द से केवल जड जगत् ही नही किन्तु सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक जगत् भी उसके साथ ग्रहण करना होगा—स्वर्ग, नरक—एक शब्द मे, जो कुछ भी है जगत् शब्द से यह समस्त ही लिया जायगा । मन एक प्रकार के परिणाम का नाम है, शरीर एक दूसरे प्रकार के परिणाम का—इत्यादि, इत्यादि । यही सब कुछ लेकर जगत् है। यही ब्रह्म (क) जगत् (ख) बन गया है—देश-काल-निमित्त (ग) मे से होकर आने से, यही अद्वैतवाद की मूल बात है। देश-काल-निमित्त रूपी काँच मे से हम ब्रह्म को देखते है, और इस प्रकार नीचे की ओर से देखने से ब्रह्म हमे जगत् के रूप मे दीखता है। इससे यह स्पष्ट है कि जहाँ ब्रह्म है वहाँ देश-काल-निमित्त नहीं है। काल वहाँ रह नहीं सकता, कारण