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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 185 of 332

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जगत् १८१

तो हमने अब क्या देखा? हमे यह अनुभव हुआ कि जड, शक्ति, मन, चैतन्य या दूसरे नामो से परिचित विभिन्न जागतिक शक्तियाँ उसी विश्वव्यापी चैतन्य के ही प्रकाश है। जो कुछ तुम देखते हो, सुनते हो या अनुभव करते हो सब उन्हीं की रचनाये हैं, उन्हीं के परिणाम है। इस कथन से और भी ठीक होगा यदि हम कहे, ये सब प्रभु स्वय ही है। सूर्य और ताराओ के रूप मे वे ही उज्ज्वल भाव से विराजते है, वे ही जननी है, धरणी है और समुद्र भी है। वे ही बादलो के रूप मे बरसते है, वे ही फिर वह पवन है जिससे हम साँस ले सकते है, वे ही शक्ति बनकर हमारे शरीर मे कार्य कर रहे है। वे ही भाषण है, भाषणदाता है, फिर सुनने वाले भी है। वे ही यह मच है जिस पर मै खड़ा हूँ, फिर वे ही वह आलोक है जिससे मै तुम्हे देख पाता हूँ; ये सब वे ही है। वे जगत के उपादान व निमित्त कारण हैं, क्रम-सकुचित होकर वे ही अणु का रूप लेते हैं, फिर वे ही क्रमविकसित होकर ईश्वर बन जाते है। वे ही धीरे धीरे अवनत होते है और परमाणु का आकार प्राप्त करते है, फिर समय होते ही अपने रूप मे अपने को प्रकाशित करते है और यही जगत का रहस्य है। "तुम्हीं पुरुष हो, तुम्हीं स्त्री हो, यौवन की चपलता से भरे हुए भ्रमणशील नवयुवक भी भी तुम हो, फिर तुम बुढ़ापे मे लाठी के सहारे कदम बढ़ाते हो, तुम ही सब वस्तुओ मे हो, हे प्रभु तुम ही सब हो।" जगत-प्रपच की केवल इसी व्याख्या से मानवयुक्ति, मानवबुद्धि परितृप्त होती है। साराश यह कि हम उनसे जन्म लेते है, उन्हीं मे जीवित रहने है और उन्हीं मे लौट जाते है।