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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 198 of 332

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Page 198

१९४ ज्ञानयोग

तुम गिर गये। जब स्मृति यह सब तुम्हारे मन मे ला देगी केवल तभी तुम वीर-से खडे हो सकोगे तथा ससार के कटाक्ष तुम हॅसकर उडा दे सकोगे। तभी वीर की तरह खडे होकर तुम कह सकोगे, “मृत्यो, तुझसे मै जरा भी नहीं डरता, तुम व्यर्थ क्यों मुझे डराने की चेष्टा कर रहे हो?” जब तुम जान जाओगे कि तुम पर मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं है, तभी तुम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकोगे एवं धीरे धीरे हम सभी इस मृत्युजयी अवस्था मे पहुचेगे।

आत्मा का पुनर्जन्म होता है इसका कौन सा युक्तियुक्त प्रमाण है? अब तक हम शका का समाधान कर रहे थे। हमने देखा कि पुनर्जन्मवाद अप्रमाणित करने के लिये जो युक्तियाँ उठाई जाती है वे खोखली है। अब पुनर्जन्मवाद के पक्ष मे जितनी युक्तियाँ हैं उनकी हम आलोचना करेगे। पुनर्जन्मवाद के बिना ज्ञान असंभव है। मानो मैने रास्ते पर एक कुत्ता देखा। मै कैसे जान पाया कि वह कुत्ता ही है? जैसे ही मेरे मन पर उसकी छाप पडी वैसे ही उसे मै अपने मन के पूर्वसंस्कारो के साथ मिलाने लगा। मैने देखा कि वहाँ मेरे समस्त पूर्व-संस्कार स्तर स्तर मे अवस्थित हैं। ज्योही कोई नया विषय आया त्योही मैने प्राचीन संस्कारो से उसकी तुलना की। जैसे ही मैने अनुभव किया कि उसी की भाँति और भी कई संस्कार वहाँ विद्यमान हैं, वैसे ही उसकी तुलना करने लगा—तभी मै तृप्त हुआ। मैने तब उसे कुत्ते के नाम से जान पाया, क्योकि पहले के कई संस्कारो के साथ वह मिल गया। जब हम उस जैसे संस्कार को अपने भीतर नहीं देख पाते हैं तभी हममे असतोप पैदा होता है। इसीको अज्ञान कहते है। और सन्तोष मिल जाने से ही ज्ञान कहलाता है। जब एक सेव