ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextजगत् १९९
तुम शायद कहोगे जीवाणुकोप (Bio plasmic Cell) के द्वारा। किन्तु यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि पिता का शरीर तो संतान मे सम्पूर्ण रूप से नहीं आता है। एक ही पिता-माता की कई संतान हो सकती है। इसलिये यदि हम यह आनुवंशिक संचारवाद् मान ले तो यह भी हमे अवश्य स्वीकार करना पडेगा कि प्रत्येक संतान के जन्म के साथ-ही-साथ पिता-माता को भी अपनी निजी मनोवृत्ति का कुछ अंश खोना पडेगा, (चूँकि उन लोगो के मत से संचारक व संचार्य एक अर्थात् भौतिक है) एवं यदि तुम कहोगे कि उनकी सारी मनोवृत्तियाँ ही संचारित होती है तो यह बात माननी पड़ेगी कि प्रथम सन्तान के जन्म के बाद ही उन लोगो का मन पूर्ण रूप से शून्य हो जायगा। फिर यदि जीवाणुकोप में चिरकाल के अनन्त सस्कार रह जायें तो पूछा जायगा कि ये कहाँ रहते हैं और किस रूप से? यह पक्ष बिलकुल असम्भव है। जब तक ये जड़वादी प्रमाणित न कर सके कि कैसे वे संस्कार उस कोष मे रह सकते है तथा कहाँ रह सकते है एव “भौतिक कोष मे ये मनोवृत्तियाँ निद्रित रहती है” इसका तात्पर्य वे जब तक समझा नहीं सकते तब तक उनका सिद्धान्त मान लेना असम्भव है। इतना तो हम अच्छी तरह समझ जाते है कि ये संस्कार मन के भीतर ही निवास करते है। मन ही बार बार जन्म ग्रहण करता आता है, मन ही अपने उपयोगी उपादान ग्रहण करता है और इस मन ने जिस शरीरविशेष के धारण करने के उपयुक्त कर्म किये है, तन्निर्माणोपयोगी उपादान जब तक वह नहीं पाता, तब तक उसे राह देखनी पड़ती है। यह हम अनुभव करते है। अतएव आत्मा के लिए देहगठनोपयोगी उपादान प्रस्तुत करने तक ही आनुवंशिक संचारवाद स्वीकृत किया जा सकता है। परन्तु