ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextबहुत्व मे एकत्व २०९
हम देखते हैं कि इस जगत् मे सभी प्रकार के सुखो की छाया के रूप मे कोई न कोई दुख रहता है। जीवन के पीछे उसकी छाया के रूप मे मृत्यु रहती है। वे दोनो सदा एक साथ ही रहते है। कारण, वे परस्पर विरोधी नही हैं; वे दोनो पूर्ण पृथक् सत्ताये नहीं हैं, वे एक ही वस्तु के दो विभिन्न रूप है, वह एक ही वस्तु जीवन-मृत्यु, सुख-दुख, अच्छे-बुरे आदि रूप में प्रकाशित हो रही है। अच्छी और बुरी ये दोनो सम्पूर्ण रूप से पृथक् वस्तुये हैं और वे अनन्त काल से चली आ रही हैं, यह धारणा नितान्त असगत है। वे वास्तव मे एक ही वस्तु के विभिन्न रूप है—जो कभी अच्छे रूप में और कभी बुरे रूप में प्रतिभात हो रही है, बस। यह विभिन्नता प्रकारगत नहीं, परिमाणगत है। उनका भेद वास्तव में मात्रा के तारतम्य मे है। हम देखते हैं कि एक ही स्नायुप्रणाली अच्छे बुरे दोनो प्रकार के प्रवाह को ले जाती है। किन्तु यदि स्नायुमण्डली किसी प्रकार से बिगड़ जाय तो किसी प्रकार की अनुभूति ही न होगी। मान लो, एक स्नायु में पक्षाघात हो गया, उस समय उसमे से होकर जो सुखकर अनुभूति आनी थी वह नहीं आयेगी, और दुखकर अनुभूति भी नहीं आयेगी। ये सुख दुख कभी भी पृथक् नहीं होते, वे मानो सर्वदा एकत्र ही रहते हैं और एक ही वस्तु जीवन मे कभी सुख, कभी दुख का उत्पादन करती है। एक ही वस्तु किसी को सुख और किसी को दुख देती है। मांसाहार से खाने वाले को सुख अवश्य मिलता है, किन्तु जिसका मास खाया जाता है उसे तो भयानक कष्ट है। ऐसा कोई विषय ही नहीं जो सब को समान रूप से सुख देता हो। कुछ लोग सुखी हो रहे हैं और कुछ दुखी। इसी प्रकार चलेगा।
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