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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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२१२ ज्ञानयोग

आप अपने देश की ही बात लीजिये—पृथ्वी पर इसके समान धनिको का देश दूसरा नही है—और दुःख कष्ट यहाँ किस प्रबल रूप में विराजमान है वह भी देखिये। अन्यान्य देशों की अपेक्षा यहाँ पागलों की सख्या कितनी अधिक है,! इसका कारण है, यहाँ के लोगो की वासनाये अति तीव्र, अत्यन्त प्रबल हैं। यहाँ के लोगों को जीवन का स्तर सर्वदा ऊँचा ही रखना होता है। आप लोग एक वर्ष मे जितना खर्च कर देते हैं, वह एक भारतीय के लिये जीवन भर की सम्पत्ति के बराबर है। और आप लोग दूसरों को उपदेश भी नहीं दे सकते कि खर्च कम करो, कारण, यहाँ चारों ओर की अवस्था ही ऐसी है कि किसी विशेष स्थान मे इतने से कम मे खर्च ही नही चलेगा—नहीं तो सामाजिक चक्र मे आपको पिस जाना पड़ेगा। यह सामाजिक चक्र दिन रात घूम रहा है—वह विधवा के आँसुओं पर और अनाथ बालक-बालिकाओं के चीत्कार पर तनिक भी कान नहीं देता। आपको भी इसी समाज मे आगे बढकर चलना होगा, नही तो इसी चक्र के नीचे पिस जाना होगा। यहाँ सभी जगह यही अवस्था है। आप लोगो की भोगसम्बन्धी धारणा भी अत्यधिक परिमाण मे विकासप्राप्त हो गई है, आप का समाज भी अन्यान्य समाजो की अपेक्षा लोगों को अधिक आकर्षित करता है। आपके भोगों के भी नाना प्रकार के उपाय हैं। किन्तु जिनके पास आपके समान भोगो की सामग्री नहीं है या कम है उनके लिये आपकी अपेक्षा दुःख भी कम हैं। इसी प्रकार आप सभी जगह देखेंगे। आपके मन मे जितनी दूर तक उच्च अभिलाषाये रहेगी आपको सुख भी उतना ही अधिक मिलेगा और उसी परिमाण मे दुःख भी। एक मानो दूसरे की छाया स्वरूप है। अशुभ कम होता जा रहा है यह बात सत्य हो सकती है, किन्तु उसके साथ ही शुभ भी कम

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