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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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Page 236

२३२ ज्ञानयोग

अधिकांश धर्म, 'जगत् मे दुःखराशि विद्यमान है' यह बात समझते है और स्पष्ट भाषा मे ही इसका उल्लेख करते है अवश्य, किन्तु मालूम होता है, सभी एक ही भ्रम मे पड गये है, वे सभी हृदय के द्वारा, भावों के द्वारा परिचालित होते है। जगत् मे दुःख है, अतएव इसका त्याग करो—यह बहुत अच्छा उपदेश है, एक मात्र उपदेश है,—इसमे सन्देह नही। 'संसार का त्याग करो!' सत्य जानने के लिये असत्य का त्याग करना होगा—अच्छी वस्तु पाने के लिये बुरी वस्तु का त्याग करना होगा, जीवन प्राप्त करने के लिये मृत्यु का त्याग करना होगा, इस विषय मे कोई दो मत नहीं हो सकते।

किन्तु यदि इन मतों का यही तात्पर्य है कि पाँच इन्द्रियों का जीवन—हम जिसे जीवन नाम से समझते है, उसका त्याग करना होगा तब फिर हमारे पास क्या शेष रहता है ? यदि हम उसे त्याग करे तो हमारे पास कुछ भी नही रहता।

जब हम वेदान्त के दार्शनिक अंश की आलोचना करेगे तब हम इस तत्व को और भी अच्छी तरह समझेगे, किन्तु आपाततः मै केवल यही कहना चाहता हूँ कि केवल वेदान्त मे इस समस्या की युक्तिसङ्गत मीमांसा मिलती है, इस समय केवल वेदान्त का वास्तव मे उपदेश क्या है, यही कहूँगा—वेदान्त शिक्षा देता है, जगत् को ब्रह्म स्वरूप देखो।

वेदान्त वास्तव में जगत् को एकदम उड़ा देना नही चाहता। वेदान्त मे जिस प्रकार चूडान्त वैराग्य का उपदेश है, और कहीं भी वैसा नहीं है, किन्तु इस वैराग्य का अर्थ आत्महत्या नहीं है—स्वयं

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