ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextसभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन २३५
वासनाओ का त्याग कर देगे तब क्या होगा ? दीवार मे कोई वासना नहीं है, उसे कोई दुःख नही भोगना होता । ठीक है, परन्तु वह कभी उन्नति भी नही करती । इस कुर्सी मे कोई वासना नही है; कोई कष्ट भी उसे नही है, परन्तु यह जो कुर्सी है, कुर्सी ही रहेगी । सुखभोगो के भीतर भी एक महानता है और दुःखभोगों के भीतर भी। यदि साहस करके कहा जाय तो यह भी कह सकते है कि दुख की भी उपकारिता है। हम सभी जानते है कि दुःख से कितनी बडी शिक्षा मिलती है। हमने जीवन मे ऐसे सैकड़ों कार्य किये है जिनके विषय मे बाद मे लगता है कि वे न किये जाते तो अच्छा होता, किन्तु यह होने पर भी ये सब कार्य हमारे लिये महान् शिक्षक का कार्य करते है। मैं अपने सम्बन्ध मे कह सकता हूँ कि मैने कुछ अच्छे कार्य किये है यह सोच कर भी मै आनन्दित हूँ और अनेक बुरे कार्य किये हैं यह सोच कर भी आनन्दित हूँ। मैने कुछ सत्कार्य किया है इसलिये भी सुखी हूँ और अनेक भ्रमो मे भी मै पड़ा हूँ इसलिये भी सुखी हूँ. कारण उनमे से प्रत्येक ने ही मुझे कुछ न कुछ उच्च शिक्षा दी है।
मै इस समय जो कुछ भी हूँ वह अपने पूर्व कर्मों और विचारो का फलस्वरूप हूँ। प्रत्येक कार्य और चिन्ता का एक न एक फल अवश्य ही है और मोटे तौर से मैने यही उन्नति की है कि मै बड़े सुख से समय काट रहा हूँ। तब भी इस समय समस्या कठिन आ पडी है। हम सभी जानते है कि वासना बड़ी बुरी चीज़ है. किन्तु वासना-त्याग का अर्थ क्या है ? शरीर-रक्षा किस प्रकार होगी ? इसका उत्तर भी पहले की भाँति आपातत यही मिलेगा कि आत्म-हत्या करो। वासना का सहार करो और उसके साथ ही वासनायुक्त