Skip to content
BharatKosha
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 242 of 332

Read in context
Page 242

२३८ ज्ञानयोग

-नहीं है। वे ही कार्य कर सकते हैं जो कार्य से किसी लाभ की प्रत्याशा नहीं करते।

एक चित्र का अधिक भोग कौन करता है ? चित्र का बेचने वाला अथवा देखने वाला। विक्रेता तो उसके हिसाब-किताब में ही व्यस्त रहता है, उसको कितना लाभ होगा इत्यादि चिन्ताओं में ही वह मग्न रहता है। ये ही सब विषय उसके मस्तिष्क में सदा घूमते रहते हैं। वह केवल नीलाम के हथौड़े की ओर लक्ष्य रखता है और क्या भाव पड़ा यही सुनता रहता है। भाव किस तरह बढ़ता जा रहा है यही सुनने मे वह व्यस्त है। चित्र देख कर आनन्द का उपभोग वह कब करेगा ? वे ही चित्र का सम्भोग कर सकते हैं जिनको उस चित्र की बिक्री-खरीद से कोई मतलब नहीं है। वे चित्र की ओर ताकते रहते हैं और असीम आनन्द का उपभोग करते हैं। इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड एक चित्र के समान है, जब वासना बिलकुल चली जायगी तभी लोग जगत् का संभोग कर सकेंगे, तब यह बेचने खरीदने का भाव, यह भ्रमात्मक स्वामित्व का भाव नहीं रहेगा। उस समय न ऋण देने वाला है, न खरीदने वाला है, न बेचने वाला है, और जगत् उस समय एक सुन्दर चित्र के समान हो जाता है। ईश्वर के सम्बन्ध में नीचे लिखी हुई बात से अधिक सुन्दर बात मैंने नहीं देखी-‘वही महान कवि है, प्राचीन कवि है, समस्त जगत् उसकी कविता है, वह अनन्त आनन्दोच्छ्वास में लिखी हुई और नाना प्रकार के श्लोकों, छन्दों और तालों मे प्रकाशित है, वासना का त्याग कर लेने पर ही हम ईश्वर की इस विश्वकविता का पाठ और सम्भोग कर पायेंगे। उस समय सब वस्तुये ब्रह्मभाव धारण

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद) · Page 242 of 332 · BharatKosha