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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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Page 244

२४० ज्ञानयोग

व्यक्ति जगत् को त्याग कर वन मे जाकर अपने शरीर को कष्ट देता है, धीरे धीरे सुखा कर अपने को मार डालता है, अपने हृदय को शुष्क मरुभूमि बना डालता है, अपने सभी भावो को मार डालता है, और कठोर, बीभत्स और रूखा हो जाता है, समझ लो कि वह भी मार्ग भूल गया है। ये दोनो दो सिरे की बाते है, दोनो ही भ्रम है, एक इस ओर, दूसरा दूसरी ओर। दोनो ही लक्ष्यभ्रष्ट है, दोनो ही पथभ्रष्ट है।

वेदान्त कहता है, इस प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं मे ईश्वरबुद्धि करो, समझो कि वह सब मे है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि उसे ईश्वररूप ही समझो—यह जान लो कि यही हमारा एक मात्र कर्तव्य है, केवल यही हमारे लिये जानने की एक मात्र वस्तु है—कारण ईश्वर सभी वस्तुओं मे विद्यमान है, उसे प्राप्त करने के लिये और कहाँ जाओगे ? प्रत्येक कार्य मे, प्रत्येक भाव मे, प्रत्येक चिन्ता मे वह पहले से ही स्थित है। इसी प्रकार समझकर हमे अवश्य ही कार्य करते जाना होगा। यही एक मात्र पथ है, अन्य नही। इस प्रकार करने पर कर्मफल तुमको लगेगा नही। कर्मफल तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं कर पायेगा। हम देख ही चुके है कि हम जो कुछ भी कष्ट भोग करते है उसका कारण ये ही सब व्यर्थ की वासनाये है। परन्तु जब इन वासनाओ मे ईश्वरबुद्धि के द्वारा वे पवित्र भाव धारण कर लेती है, ईश्वरस्वरूप हो जाती है, तब उनके आने से भी फिर कोई अनिष्ट नही होता। जिन्होंने इस रहस्य को नही जाना है, उनको इसे जानने से पहले तक इसी आसुरी जगत् मे रहना पडेगा।' लोग नही जानते कि यहाँ उनके चारों ओर सर्वत्र कितने अनन्त