ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
DevanagariHindipublished332 pages
Page 310 of 332
Read in contextPage 310
३०६
ज्ञानयोग
शासन करने को यदि कोई न रहे तो हम अपना जीवन किस तरह बिता सकते हैं ? सच बात तो यह है कि हमें इस प्रकार का व्यवहार अच्छा लगता है। इस भाव से रहना हमारा अभ्यास होगया है और इसीलिये हम ऐसे जीवन को पसंद करते है। प्रति दिन यदि हमें किसी ने नहीं डॉटा तो हमे सुख नहीं मिलता। यह वही कुसंस्कार है। किन्तु अब यह बात कितनी ही भयानक क्यों न मालूम हो, ऐसा एक समय अवश्य ही आयेगा जब अतीत की सारी बातों का स्मरण कर, जिन कुसंस्कारों ने शुद्ध अनन्त आत्मा पर आच्छादन फैला दिया था, हम उन प्रत्येक की हँसी उड़ायेंगे और आनन्द, सत्य व दृढ़ता के साथ कहेगे कि मै ही 'वह' हूँ, चिरकाल वही था और सर्वदा वही रहूँगा।