कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमैं प्रगट करूँगा कि, अपना धर्म क्या है ? पर धर्म क्या है ? जो लोग अपने कुल रीतिको अथवा किसी विशेष नियमकोही धर्म माने बैठे हैं वे सब भूलमें फँसे हैं । जो नाना प्रकारके एकदेशीमें फँस धर्म द्वेषके लिये मरते मारते, निन्दा स्तुतिमें अपना दिन बिता रहे हैं, वे महान् अज्ञानतामें फँसकर अपने यथार्थ कर्तव्य और धर्मको कभी नहीं पा सकते ।
मत मतान्तरके प्रचारक—कालपुरुषने अनन्त प्रकारके मजहबोंको प्रचलित करके जीवधारियोंको फँसा मारा । यही मुख्य कारण है कि, सब मनुष्य अपने यथार्थ धर्मको छोड़कर कालपुरुषके धोखेमें पड़े हैं उसको पहचान नहीं सकते ।
ज्ञाता—कृष्णचन्द्रने अर्जुनसे महाभारत करवाकर पाण्डवोंको राज्यगद्दी पर बिठा दिया । अन्तमें, कृष्ण भगवान् पाण्डवोंसे अलग होगये और उन्हें उनका धर्म सँभालनेके लिये कहा । स्पष्ट तो उन्हें क्षत्रियोंका धर्म लड़ाई बतलाकर, लड़ाई कराई पर भीतरी औरही आशय रखा । इसका आशय कोई २ साधूही समझते हैं ज्ञानी ही यथार्थ धर्मकी सुधि जानते हैं ।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठिधात् ।
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
अर्थ—(सद्गुणोंसे युक्त पराये धर्मसे अपना धर्म गुणहीन भी हो तो भी श्रेष्ठ है, अपने धर्ममें मरना श्रेष्ठ है, पराया धर्म भयको प्राप्त करनेवाला है ।
यहां तो श्रीकृष्णचन्द्रने क्षत्रियधर्म बतलाकर अर्जुनको युद्धके लिये प्रस्तुत किया अर्जुनने भी युद्ध और रक्तपातही अपना धर्म समझा, पर श्रीकृष्ण भगवान्ने अर्जुनको इस श्लोकमें योगज्ञान आदिक सिखलाया जिससे धर्म जाननेका मार्ग मिले । प्रगट तो क्षत्रियधर्म बतलाया पर कृष्णके जितने वाक्य होते थे उन सभोंके दो अर्थ, दो भाव और दो आशय हुआ करते थे, मैंने इसी पुस्तकमें श्वपच सुदर्शनजीका वर्णन किया है, कि वह मनुष्य थे उनमें मनुष्यता थी जिसको कृष्ण भगवान्ने प्रगटरूपसे सबको दिखला दिया यह सिद्ध कर दिया कि, उतने लोगोमें सुदर्शनजीके अतिरिक्त कोई सच्चा भक्त मनुष्य न था । जो सच्चे मनुष्य हैं जिन्होंने यथार्थ मनुष्यत्वको पाया है वेही पर और अपर धर्मकी महिमा जान सकते हैं, वही अपना पराया समझ सकते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । इसीलिये विवेकवान् विचारवान्को, मनुष्य और अविवेकी मूर्खको पशु कहते हैं ।
अधर्म—काम, क्रोध, लोभ, मोह, युद्ध आदिक मनुष्यके यथार्थ धर्म नहीं, अपना धर्म तो वह है जिससे केवल अपना स्वरूप जाना जावे अपने यथार्थको प्राप्त करे ।