कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमाता पिता पुत्रकी रक्षा सेवा स्वार्थ जानकर करते हैं, पुरुष स्त्रीको अपने सुखके लिये चाहता है, स्त्री पुरुषको स्वार्थवश हो प्यार करती है, सांसारिक प्रेम कोई न कोई स्वार्थसेही हुआ करता है । निःस्वार्थ हर समय रक्षा करता है वही सत्य परमात्मा अपना है, नहीं तो कोई किसीका नहीं है । माता पिताके अन्तःकरणमें बालककी सेवा करनेका अङ्कुर डालनेवाला भी वही है । यदि उसकी कृपा न हो तो माता पिता अथवा कोई भी प्रेम न करे । सारे जीवधारी अपने बच्चोंको प्रेम और प्रीतिके साथ पालते हैं । किसी प्रकारकी आशा नहीं रखते । ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि, जबतक बच्चा स्वयं अपना व्यवहार चलाने योग्य नहीं होता तबतक (मनुष्यके अतिरिक्त सब जीवधारी उसका पोषण और पालन करते हैं, पीछे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, पर मनुष्य अपने बच्चोंकी सेवा और पोषण पालन करके उससे बदलेकी इच्छा रखते हैं । जिसने उनके (माता पिता) अन्तःकरणमें बालकका प्रेम और प्रीति वही बदला भी दिला सकता है, परमात्माको धन्य है जो सर्व कुछ करनेपर भी किसीसे कुछ नहीं चाहता । पशु अपने बच्चोंसे इतनी प्रीति करते हैं कि, मनुष्य उनकी समता नहीं कर सकते, जैसा कि, इसी पुस्तकके देखनेसे प्रगट होगा कि, पशु अपने बच्चोंसे कितनी मुहब्बत करते हैं पर वे कुछ भी बदला नहीं चाहते । उससे उल्टा मनुष्य नाना प्रकारकी आशाओंसे घिरा हुआ अपनी सन्तानसे बहुत कुछ चाहता है । प्रत्येक जीवधारी कामके वशमें होकर स्त्रीसे सम्भोग करता है, जिससे सन्तानकी उत्पत्ति होती है । जिस प्रकार अपना सुख विचार कर सम्भोग करता है उसी प्रकार प्रेमके वश होकर उसकी रक्षा और पोषण पालन करता है, यह ईश्वरी नियम है । माता इस कारण भोजन नहीं करती कि, वह बच्चेको पहुँचे, वरन् वह भूखको मिटानेके लिये भोजन करती है पर विश्वम्भर स्वयं बच्चेको गर्भमें भी भोजन पहुँचाता है, जिसको विश्वम्भर पर विश्वास है वह संसारकी आशाओंसे मुक्त होता है । जो सर्व रक्षक परमात्माको सत्य जानता है, वह सांसारिक प्रेम और प्रीतिसे निर्मूल होजाता है । सांसारिक स्नेहको मूर्खता । अज्ञानता समझकर त्याग देता है ।
गजल
मुहब्बत देह और दिलबर नहीं होता नहीं होता ।
कि, दो मिहमानका एक घर नहीं होता नहीं होता ॥
चढ़े मन्सूर और ईसा हजारों दारके ऊपर ।
कि रौशन रोजमें शब्रे पर नहीं होता नहीं होता ॥