कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextअमलसे आदमी है वरनः चौपाया विचारा है ॥
अमल कर नेक गर आज्जिज अमल नस्क मिटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ५ ॥
ईश्वर विषयक सिद्धान्त
पुरुष सूक्तका सिद्धान्त
एक पुरुष है जिसके बहुतसे शिर, नाक, आँखें, कान, मुंह, जिह्वा, पद और अङ्ग हैं, गुप्त प्रकट असंख्य ही इन्द्रियाँ हैं, सारे संसारमें वही व्यापक है। सब जीवधारी उसीकी आँखोंसे देखते हैं, उसीके कानोंसे सुनते हैं, वही सबके अन्तःकरणमें है, वह तीनों कालमें समान है, सबका स्वामी है, अद्वैत और अनुपम है, अनाम है, अक्रिय है, उसका कोई स्थान नहीं सब स्थानोंमें वही है, यह संसार उसके प्रकाशका लघुसे लघु किरण है, ऋग, यजु और साम ये तीनों वेद रज, सत, तम ये तीनों गुण उसीके प्रागटच का परमाणु है, उसीसे उत्पत्ति स्थिति और लय है। प्रणवके तीनों अक्षर उसीसे प्रगट होते हैं वह पुरुष जब स्वांस नीचेको छोड़ता है तो सारा संसार जीवित हो जाता है ऊपर को खींचता है तो प्रलय हो जाता है, ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं पर वह पुरुष आप निलैप रहता है।
जब वह सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है तो प्रथम हिरण्यगर्भको प्रगट करता है इससे सब जड़ चैतन्य और विराट पुरुष प्रगट होते हैं।
हिरण्यगर्भ अर्थात्-प्रजापति उससे मनु-अर्थात् आद'म और मनरूप-अथवा हौवा होते हैं जिससे सृष्टि होती है।
यज्ञ और जगतका एकही अर्थ है। पुरुष यज्ञ स्वरूप है, सब वस्तुयज्ञसे हुआ करते हैं उसीमें हवन होनेसे लय हो जाते हैं। वेदके ज्ञाता लोग इसी कारण अङ्गोंके समान है। ज्ञानी, पण्डित, वेद और शास्त्रके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, शास्त्रानुसार कर्म करनेवाले, सदाचरणमें बरतनेवाले, पापोंसे घृणा करनेवाले, दैवी सम्पत्तिसहित अपनी आयुको जगत्के उपकारमें बितानेवाले, ऋषि और मुनियोंके समान शरीरयात्रा करते हुये सर्वदा पुरोपकारमें रहनेवाले, विराट पुरुषके शिर हैं। राजा, तन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य आदि जिनसे जगत्की रक्षा होती है जिसके द्वारा सब अपनी मर्यादापर चलते हैं, वाँह हैं। वाणिज्य करनेवाले,
१ समष्टि सूक्ष्म अभिमानी देवताको हिरण्यगर्भ कहा करते हैं। २ समष्टि स्थूलके अभिमानी देवताको विराट कहते हैं। ३ मानवी सृष्टिके प्रवर्तकोंको पाश्चात्य साहित्यकवाबा आदम और भी हौवा कहते हैं।