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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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विश्वास हो । सुथरे शाहने उसे पहन लिया, वह पैरमें बराबर आगया । यह कौतुक देखकर सब आश्चर्यमें आये कि, यह सवा हाथका लम्बा जूता इस साधुके पगमें कैसे अट गया ? बादशाहको विश्वास होगया कि, यह जूता और प्याला सुथरेशाह काही है, उन्हींको दे दिया । पहले वह जूता खुदाका था तब सबने उसको महान् पवित्र और ईश्वरका प्रसाद समझा । पीछे जब सुथरे शाहका होगया तब सब लोगोंको घृणा हुई, सब तोबः तोबः और बहुत पश्चात्ताप करने लगे क्योंकि, उन्होंने सुथरेशाहके पिशाबको आंख और माथोंमें लगाया तथा आचमन किया था ।

समीक्षा — सोचना चाहिये कि, मुसलमानोंका बेचून बेचरा खुदा महजिदमें आवे एवं लोगोंके भयसे जूता छोड़कर भाग जावे । शोक है ऐसी समझ बूझपर । यही सांसारिक तथा प्राकृतिक जनोंकी बुद्धि और समझ है ऐसाही उनका खुदा है । कितने पीर, पैगम्बर, ऋषि, मुनि, सिद्ध ईश्वर करके जगतमें पूजित हैं उनमेंसे कितने पशुओंकी योनिमें मारे मारे फिरते हैं । मनुष्योंसे भी बहुत दुःखी और हीनावस्थामें हैं ।

किसका भजन करे ।

६ प्रश्न — जब ईश्वरोंकी यह दशा है तो किसका नाम जपना चाहिये, अंतरङ्ग और बहिरङ्ग भजन किस प्रकार और किसका करना चाहिये ? ईश्वरका नाम क्या है ?

उत्तर — जितने नाम हैं वे सब उन्हींके हैं, जिनका रूप संसारमें प्रगट है । जितने रूप हैं सब नाशमान हैं जो नाशमान हैं वह ईश्वर नहीं । भजनके चार स्थान हैं । नाभि, हृदय, जिह्वा और मस्तिष्क । यह सब मिथ्या है पर जैसे दूध पीता बच्चेको छोड़कर उसकी माता कहीं बाहर जाती है वह बच्चा भूखा होजाता है वह चार प्रकारका कर्म करता है यानी रोता है चिल्लाता है, मुँह पसारता है और हाथ पाँव मारता है यद्यपि भूखका नामभी नहीं जानता, न दूधको अपना भोजन समझता है, न कोई उपाय कर सकता है, पर उसके रोने चिल्लाने और मुँह पसारनेसे उसका कार्य सिद्ध होता है । उसकी ऐसी क्रियाको देखकर माता दौड़के आती है दूध पिलाकर उसको सन्तुष्ट करती है बालक सुखको प्राप्त होता है, इसी प्रकार भजनके चारों स्थान असत्य हैं पर उन्हींके द्वारा अभ्यास करनेसे ईश्वरका कृपापात्र बनता है । इस कारण ईश्वरके चाहनेवालोंकी भजन करना चाहिये । उसीसे इष्टकी प्राप्ति होती है । जैसे माता पिता देखते हैं कि, बच्चा रोटी खाने योग्य हुआ तो उसको नानाप्रकारसे स्वादिष्ट भोजन देते हैं । फिर कुछ समय बीतने पर उसको पढ़ाते हैं लौकिक पारलौकिक विद्याकी शिक्षा देते हैं ।