कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextगया जो फिर कभी कोइ न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भूलावे ॥
न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरी से पावे जीव आनन्द ॥
छुड़ाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
इस आसी बन्दः को अपने करमसे । बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥
गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । कि रख लीजे पिनह अपनी शरमसे ॥
अरज करता है आजिज दीदःनमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥
छुड़ाले बन्दे को अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
गुरु की प्रशंसा
खोलं अब खुद जबों ब हम्दो सिपास । मुशिदे मिहरबान भिच्छुक दास ॥
अहल इसरार जिसने बतलाया । जो न इन्सान के क्रीन कयास ॥
सोई सतगुरु कबीर की मूरत । अमलो इल्म ज्ञान ध्यान की रास ॥
आत्मा दास मिहर आतम लाभ । जिसने पहनाये मुझको हंस लवास ॥
खाक पा जिस्से दीदः मन रोशन । उनकी शफकत है सारी इल्म असास ॥
हूँ गुनाहों से सरनगूँ नादिम । तौ भी अपनी शरण का उनको पास ॥
शुक्र गुरुदेव का कर ऐ आजिज । जब तलक तेरे तनमें होश हवास ॥
छन्द--- अत्र सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये ।
अगम अविचल अलख लखि निहअन्त वाको जानिये ॥
लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये ।
देखो दो नेत्र कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥
अविगत अलेख भौ लेख नहिं सो एक बन्दी छोरहै ।
नर देह बाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥
जो नाम ररत काल डरत है हरत सो जम जोर है ।
बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥
लोमस भुशुंड के झुंड ऋषिमुनि जासु गुण वर्णन करें ।
सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित्त चरणन धरे ॥
ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरनन परे ।
बहु सिद्ध सो गुरुङ् गोरख आय तुम शरणन तरे ॥
कोटिन पैगम्बर पीर गये भव तीर नाम कबीरते ।
केहि कहत बनत अगनिंत ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥
धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नारो छीरते ।
सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पदथीरते ॥
विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा ।