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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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सत्य सार सबहिनको मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
स्वासासार सत्य कर भाऊ । अमी आदि उपजी तेहि नाऊ ॥
सत्यसार स्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
स्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
स्वासा अजर नाम अनुमाना । परगट अमी सो कहों सुजाना ॥
अदल नाम स्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुबासा ॥
स्वासा निरञ्जन भया अनुसार । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
स्वासा पांच परगट विस्तारा । पांच अमीको भयो पसारा ॥
पांच अमी पांचों अधिकारा । पांचों तत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक पसारा । पांचों तत्व गुप्त अनुसार ॥
समय-पांच अमीते पांच भये, पांच नाम अधिकार ।
सनै सनैही सब भया, अमी तत्व विस्तार ॥

चौपाई

सोरह स्वासा सार सुहाया । सोरह सुतकी प्रगटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम स्वासा अनुसारि । उपजी सुरति हंसपति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि मांहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निरमाया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पांचों अमी सुरतिके अंगा । नाल सात उपजी तेहि संग ॥
सात नाल संग एकै भाऊ । सातो सुरत पुरुष परगटाऊ ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊ ॥
पुरुष सुरति कहैं अगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंप तेहो दीना ॥
सातौं नाल सुरति जब पाई । ताहि नालमों रही समाई ॥
छिन बाहर छिन भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअच्छर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह दियेऊ ॥
सत्तपुरुष निज सुरति सनेही । पारस आदि रची सबदेही ॥
समय-अधर निहछर संग लिये, सेत ध्वजा फहराय ।
पलटि समानि सुरति पुरुष, रहि सो अछप छिपाय ॥

सोलह सुतकी उत्पत्ति-चौपाई ।

सुरत सनेह प्रभु इच्छा कीन्हीं । सोरह सुत उपजावे लीन्हीं ॥