कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextचौपाई ।
सेवा करत बहुत दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधर धुनि भयऊ ॥
अधर अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
सबतर लोक दीप रहि छाई । बिमल बास भरपूर समाई ॥
अगर बास सब हंसन पाई । निर्मल बास सदा सुखदाई ॥
पीय अमृत सबै अधाने । अपने अपने लोक सिधाने ॥
और पुत्र सब अच्छप छिपाये । धरम धीर सबते बरियाये ॥
धरमराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥
छलके बचन पुरुष सो लीन्हा । पाछे दुदैं लोक महैं कीन्हा ॥
समय—और सबै सुत बैठे, अपने अपने थान ।
धरम रोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥
धर्मदास बचन—चौपाई ।
धर्मदास बिनवै कर जोरी । साहब संसय मेटहु मोरी ॥
और सब सुत अच्छप छिपाने । धरमराय कस भये बिगाने ॥
कैसे और सबे सुत भारी । धरमराय कस भये विकारी ॥
सतगुरु बचन ।
धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सँदेश आदि समझाई ॥
जब प्रगटे प्रभु अम्मर तारा । निकसी अधर निअच्छर धारा ॥
भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर वासकी खानी ॥
पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
अगर छिपाय आप महैं राषा । सुरति सनेह मुख प्रगटी भाषा ॥
प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥
भाषा बचन भया अधिकांश । भाषहिंते सकलो विस्तारा ॥
भाषा बचन पुरुष उच्चार । भाषा ते सकलो व्यवहारा ॥
भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोक के द्वारा ॥
स्वैसा सार तार जुरियाना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥
भाषा स्वर बानी अनुमाना । बचन समान शब्द बन्धाना ॥
निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान सबै जग सारा ॥
नाम सनेह शब्द मँझारा । बचन समान स्वास गुञ्जारा ॥
स्वासा नेह देह भइ जबही । भाषा सहज बचन भा तबही ॥