कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextचार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश जाके सुत भाई ॥
एक अंस चौभाग जो कीन्हा । ताते एक गुप्त करलीना ॥
एक अंसते गुप्त छिपाई । तीन अंस संसार पठाई ॥
अंसहि अंस भेद नहीं बीना । यह अचरज अच्छोने कीना ॥
जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठाणो ॥
साखी—यह परपञ्च बेचूनका, तुमने कहा न भेव ।
आप सारत होइ बैठा, तु चार करत हो सेव ॥
मुहम्मद वचन ।
कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लज्जमी कइबुनिवाई ॥
जब नहीं पिण्ड ब्रह्मण्ड अस्थूला । तब नहींतौ सृष्टिको मूला ॥
नादनकी कहिए उतपानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥
साखी—बुज्ररुग हकीकत सब कहो, किस विध भया प्रकाश ।
जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आस ॥
कबीरवचन ।
सुनो महम्मद साँचे पीरा । समरथ हुकुम खुदआदि कबीरा ॥
अब हम कहें सुनो चितलाई । आदि अन्तको खबर बताई ॥
प्रथमै समरथ आदि अकेला । उनके संग था नहीं चेला ॥
साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हत्यौ तिहि माँह ।
ज्यों तरुवरके बीचमें, पुहुप पाय फल छाँह ॥
अब इस स्थानपर कबीर साहब-मुहम्मद-साहबको उत्पत्तिके आदि इत्यादि का सब वृत्तान्त सुनाते हैं और वेदों तथा पुस्तकोंके निर्माणका सब विवरण करते हैं । किंतुनेही प्रश्नोत्तर दोनों महाशंयोंमें हुए और कबीर साहबने लाहूत स्थानसे परमेश्वरका निवासस्थान पृथक् बताया और वेद तथा पुस्तक सबका आदि अक्षर अर्थात् लाहूत स्थानसे प्रगट किया यह बात सुनकर मुहम्मद साहबने अस्वीकार किया ।
मुहम्मद वचन ।
पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कुछ नहीं चले तुम्हारा जोरा ॥
अच्छर हुकुम को मेटन हारा । चार वेद जिन कीन्ह पसारा ॥
कबीरवचन ।
सुनिए सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥
मेटूं अच्छर का विस्तारा । मेटूं निरञ्जन सकल पसारा ॥