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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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तुम आपनो फ़रमान चलाये । खुदको भेद तुम धरु छिपाये ॥
जो यह भेद तुम परगट करिहौ । तो तुम कौलके बाहर परिहौ ॥
चारो कलमः परगट भाखो । पँचवाँ कलमः गुप्त राखो ॥
पँचवाँ कलमः इल्म फ़कीरी । जाके पस्ने कुफ़ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । उबलों अपनो कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समरथ केरी । पाँचों कलमः दिलमें फेरी ॥
साखी—हम काशीको जात हैं, तुम मक्के अस्थान ।
हम रामानंद गुरु करें, तुम देव जगत फ़रमान ॥
फ़रमान जग को दीजिये, उलटी अदल चलाय ।
तुम कलमः का हुक्मले, निभंय निसान बजाय ॥

मुहम्मद साहबको कबीर साहबने चार कलमः प्रगट करनेको कहा, और एक कलमः को गुप्त रखनेके लिये कहा । कुल पाँच कलमः मुहम्मद साहबको पढ़ाया जिसमेंसे एक छिपा रखनेके लिये कह दिया, चार कलमः मुसलमानोंको बतानेके लिये कहा । जब मुहम्मद साहब वह कलमः पढ़ा करते थे उस समय किसीको निकट आने नहीं देते थे, उस कलमका भेद मुहम्मद साहबके अतिरिक्त और कोई भी जानता नहीं था । कबीर साहबने मुहम्मद साहबको अपना पान दिया और मुहम्मद तथा मुहम्मदियोंको मुक्ति दिलानेकी आशा दिलाई । सो चार कलमः तो मुसलमानोंको मिले और पाँचवाँ कलमः स्वयम् मुहम्मद साहबके निमित्त था दूसरोंको उसका कुछ भी पता नहीं है ।

अट्टाईसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें कलमका वृत्तान्त ।

मशकात बाब क्रैयाम शहर रमजान फ़स्ल औबल ज़ेद बिन साबितकी खायत दोखारी और मुसल्लमसे यों लिखा है कि, हज़रत रसूल अल्लाहने मस्जिद में चटाईकी एक झोपड़ी बनाई थी, और इस झोपड़ीमें अकेले निमाज पढ़ा करते थे । जब लोगोंने यह दशा देखी तो वे लोग आने लगे । तब भी कई रात्रियोंके उपरान्त एक रात्रिको आए बाहर नहीं निकले तब लोग बाहर खड़े खड़े खँखारने लगे, कदाचित् हज़रत आवाज सुनकर बाहर निकल आवें और निमाज़ पढ़ें परन्तु हज़रत न आये बल्कि कह दिया कि, तुम्हारी रुचि सबैव निमाजपर रहे—पर मैं इस कारण निमाजके निमित्त बाहर नहीं आता कि, कहीं खुदा इस निमाजको भी तुम पर फर्ज न करदे । क्योंकि, यदि यह तुम्हारा फर्ज होगया तो तुम उसको पूर्ण