कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextउसने पीछे फिरकर भी नहीं देखा था। अब उनको नाई मिलता तो कहोसे ! अब तो नाईके बिना काजी बहुत घबराया, चारों ओर लोग 'नाई ! नाई !' कहते दौड़ने लगे। उस समय कबीर साहबने काजीको सम्बोधन करके यह शब्द कहा—
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
अंखत बकत रहौ निसि बासर मति एको नहि जाना ॥
सकति न मानो सुनति करत ही मैं न बदोंगा भाई ॥
जो खुदाय तुब सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥
इतना कहकर वहाँ खड़े ब्राह्मण (हिन्दुओं) की ओर दृष्टि करके घालि जनेऊ ब्राह्मण होना, मेहरी क्या पहिराया ।
वह तो जन्मकी सूर्यन पिरोसी, सो तुम क्यों खाया ॥
हिन्दु तुएक कहाँसे आया, किन यह राह चलायी ।
दिलमें खोज खोज दिलहीमें, विहिस्त कहाँ किन पायी ॥
इतना कहकर कबीर साहब उठ खड़े हुए। उनके शरीरका बन्धन सब आपही खुलकर गिर पड़ा यह देखकर लोग बहुत आश्चर्यित हुये।
फिर कबीर साहबने काजीसे कहा—
कहै कबीर सुनोहो काजी। यह सब अहै शैतानी बाजी ॥
छिः!! छिः!! क्या इसीको मुसलमानी कहते हैं ?
यहि तरीका जो मुसलिम होई। तोपै दोजख परै न कोई ॥
फिर मुस्कुराते हुए कबीर साहबने काजीसे कहा, भाई ! अबतक तो खुद तुम्हें मुसलमानीकी खबर नहीं है, तब तुम मुझे कैसे मुसलमान करने आये थे ?
तुम तो मुसलिम भये नहि भाई। कैसे मुसलिम करहू आयी ॥
यदि तुम मुसलमानीका यथार्थ मार्ग जानते हो तो मुझसे कहो
जेहि तरीक सो साहिब राजी। सो तरीक मोहि कहिय काजी ॥
मारफ़तकी मुसलमानी, कहिये हजरत मोहि ॥
पाक जात केहिविधि मिले, सो मैं पूछौं तोहि ॥
यह सुनकर काजीने कहा, हम शरआके पाबन्द हैं, हमको मारफ़तकी बातमें जवान हिलानेकाभी हुक्म नहीं है—
काजीके उत्तरको सुनकर कबीर साहबने कहा, बस इतनेही पर काजीपना करनेका अभिमान करता है ? फिर यह शब्द कहा—