कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextयह सुनकर वह मुसलमान चुप हो गया । एक दिन कबीर साहब राम, कृष्ण, गोविन्दका नाम लेते सुनकर एक हिन्दूने कहा, 'क्यों बे ! मुसलमान होकर हमारे ईश्वरका नाम लेता है ?' तब कबीर साहबने उत्तर दिया—
शब्द—भाईरे दुई जगदीश कहांतें आये कौने मति भरमाया ।
अल्लहः राम करीमा केशव हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते बनता तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइ कर थापे इक निमाज इक पूजा ॥
वहि महादेव वही मुहम्मह ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावे एक जमीं पर रहिये ॥
वेद किताब पढ़ें वे खुतवा वै मूलना वे पांडे ।
विगत विगतकें नाम धरावें एक मटियाके भांडे ॥
कहैं कबीर वै दूनों भूले रामैं किनहु न पाया ।
वैं खसिया वे गाय कटावैं वादे जन्म गवाँया ॥
ऐसेही अवसर पर एक दिन एक ब्राह्मणने व्यंगसे कहा कि, भाई ? तू उससे क्या पूछता है, राम नाम बिना मुक्ति किसकी हुई है ! रामनाम सब वेदोंका सार है, अल्लाह, खुदामें क्या धरा है ! इसलिये तो कबीर अल्लाह खुदा छोड़कर राम राम कहता है । इसपर कबीर साहबने उसको उत्तर दिया—
शब्द - पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
राम कहे जगत गति पावे, खांड कहै मुख मीठा ॥
पावक कहै पांव जो दहै, जल कहे तिरषा बुझायी ।
भोजन कहे भूख जो भागै, तौ दुनिया तरि जायी ॥
बरक संग सुवा हरि बोलै, हरि प्रताप नहि जानै ।
जो कबहुँ उडि जाय जंगलको, तो हरि सुरति न आनै ॥
विनु देखे विनु अरस परस, विनु नाम लियेका होई ।
धनके कहे धनिक जो होवे, निर्धन रहत न कोई ॥
सांची प्रीति विषय माया सो, हरि भगतनकी हांसी ।
कहहि कबीर एक राम भजे विनु, बाँधे जमपुर जासी ॥
जोई आकर कबीर साहबके विचारका खण्डन करना चाहता वह आपही परास्त होकर चला जाता. तब तो बिद्वेषियों मजहबियोंको बड़ी कठिनाता पड़ने लगी; क्योंकि, बालक कबीरकी अद्भुत लीला और चरित्रको देखकर